कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के चर्चित समाजशास्त्री प्रोफेसर जेसन अर्डे ने साहित्यिक चोरी और शैक्षणिक दावों की जांच के बीच अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। विश्वविद्यालय ने नए तथ्यों के सामने आने के बाद औपचारिक जांच शुरू की है।
लंदन: ब्रिटेन के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के चर्चित समाजशास्त्री प्रोफेसर जेसन अर्डे ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका इस्तीफा ऐसे समय आया है जब विश्वविद्यालय ने उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड और अकादमिक योग्यता से जुड़े नए तथ्यों के आधार पर औपचारिक जांच शुरू की है। हाल के सप्ताहों में उन पर शोध कार्य में साहित्यिक चोरी (Plagiarism) के आरोप लगे हैं, साथ ही उनके कुछ व्यक्तिगत उपलब्धियों और फंडरेजिंग संबंधी दावों पर भी सवाल उठाए गए हैं।
जेसन अर्डे ने अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए कहा कि लंबे समय से चल रहे आरोपों, सार्वजनिक बहस और व्यक्तिगत टिप्पणियों का उनके जीवन और परिवार पर गहरा प्रभाव पड़ा है। हालांकि उन्होंने अपने बयान में आरोपों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि आलोचना अकादमिक जीवन का हिस्सा होती है, लेकिन जो परिस्थितियां बनीं वे सामान्य शैक्षणिक असहमति से कहीं आगे बढ़ गईं।
कौन हैं जेसन अर्डे?
जेसन अर्डे वर्ष 2023 में 37 वर्ष की आयु में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनने वाले सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर बने थे। उनकी नियुक्ति केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं बल्कि प्रेरणादायक व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी के कारण भी चर्चा में रही। अर्डे ने कई मंचों पर बताया था कि बचपन में उन्हें डिस्लेक्सिया (Dyslexia), ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर और विकास संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार वे लगभग 11 वर्ष की उम्र तक स्पष्ट रूप से बोल नहीं पाते थे और किशोरावस्था के अंतिम वर्षों तक पढ़ना-लिखना भी नहीं सीख पाए थे। बाद में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की और समाजशास्त्र के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई।
प्लेगरिज्म के आरोप कैसे सामने आए?
जुलाई के अंतिम सप्ताह में ब्रिटिश मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया कि वर्ष 2015 में प्रस्तुत जेसन अर्डे के पीएचडी शोधप्रबंध में कुछ ऐसे अंश पाए गए, जो पहले प्रकाशित एक अन्य शोध पत्र से काफी हद तक मिलते-जुलते थे। रिपोर्टों में कहा गया कि कई हिस्सों में भाषा और संरचना लगभग समान दिखाई देती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और विश्वविद्यालय की जांच जारी है। शुरुआत में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने कहा था कि जिस विश्वविद्यालय ने अर्डे को पीएचडी की डिग्री प्रदान की थी, वहां इन आरोपों की पहले समीक्षा की जा चुकी है। लेकिन बाद में नए तथ्यों के सामने आने के बाद कैम्ब्रिज ने अपनी अलग जांच शुरू करने का निर्णय लिया।

शैक्षणिक योग्यता और उपलब्धियों पर भी उठे सवाल
प्लेगरिज्म के आरोपों के अलावा अर्डे के कुछ व्यक्तिगत दावों पर भी सवाल उठाए गए हैं। ब्रिटिश मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने 35 दिनों में 30 मैराथन दौड़कर और अन्य खेल अभियानों के माध्यम से लगभग 55 लाख पाउंड (करीब 74 लाख अमेरिकी डॉलर) चैरिटी के लिए जुटाए। इन दावों को लेकर जब सवाल उठे तो अर्डे ने कहा कि यह धनराशि लगभग 20 वर्षों में कई लोगों के सहयोग से जुटाई गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि गोपनीयता समझौतों (Non-Disclosure Agreements) के कारण वे उन सहयोगियों के नाम सार्वजनिक नहीं कर सकते। इन दावों की भी अलग-अलग स्तर पर जांच और सत्यापन की प्रक्रिया जारी है।
विश्वविद्यालय ने क्यों शुरू की नई जांच?
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने अपने बयान में कहा कि उसे हाल ही में कुछ नए तथ्य और सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। इन्हीं के आधार पर विश्वविद्यालय ने औपचारिक जांच शुरू करने का फैसला लिया। विश्वविद्यालय ने यह स्पष्ट नहीं किया कि जांच किन-किन बिंदुओं पर केंद्रित होगी, लेकिन माना जा रहा है कि इसमें शोध कार्य, शैक्षणिक योग्यता और सार्वजनिक रूप से किए गए कुछ दावों की समीक्षा शामिल हो सकती है। जांच पूरी होने तक विश्वविद्यालय ने मामले पर विस्तृत टिप्पणी करने से इनकार किया है।
जेसन अर्डे का बयान
इस्तीफे की घोषणा करते हुए जेसन अर्डे ने कहा कि वे लगातार लग रहे आरोपों और सार्वजनिक चर्चा से मानसिक रूप से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी अकादमिक व्यक्ति को आलोचना स्वीकार करनी चाहिए, लेकिन उनके अनुसार पिछले कुछ सप्ताहों में जो परिस्थितियां बनीं, उन्होंने उनके निजी जीवन और उनके करीबी लोगों पर गंभीर प्रभाव डाला। उन्होंने यह भी कहा कि उनका इस्तीफा किसी आरोप को स्वीकार करना नहीं है, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे दबाव और परिस्थितियों के कारण लिया गया व्यक्तिगत निर्णय है।
समर्थन और विरोध दोनों सामने आए
इस पूरे विवाद के दौरान जेसन अर्डे को कई शिक्षाविदों, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक हस्तियों का समर्थन भी मिला। कुछ शिक्षाविदों ने आरोपों को पूर्वाग्रह से प्रेरित अभियान बताया और कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच पूरी होनी चाहिए। दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि किसी भी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शैक्षणिक ईमानदारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और सभी आरोपों की पारदर्शी जांच आवश्यक है।
अकादमिक ईमानदारी पर फिर शुरू हुई बहस
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर शोध कार्यों में मौलिकता, संदर्भों के सही उपयोग और विश्वविद्यालयों की जांच प्रक्रियाओं को लेकर चर्चा तेज कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि प्लेगरिज्म या शैक्षणिक अनियमितता से जुड़े प्रत्येक मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जाए। साथ ही आरोपित व्यक्ति को भी अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।












