न्यायपालिका में AI की भूमिका पर CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान, बोले- तकनीक सहायक है, फैसला इंसान का ही होगा

CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल को लेकर अहम बात कही है। उन्होंने कहा कि AI न्यायिक प्रक्रिया में मददगार तकनीक हो

केंद्र सरकार अगले सप्ताह लोकसभा में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) पेश कर सकती है। प्रस्तावित विधेयक को लेकर देश के कई चर्च और ईसाई संगठनों ने चिंता जताते हुए इसका विरोध शुरू कर दिया है।

नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) Surya Kant ने न्यायपालिका में तकनीक के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने कहा कि AI न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक कुशल, पारदर्शी और सुलभ बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन यह मानवीय विवेक, संवेदनशीलता और न्यायिक निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं बन सकता।

नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि आधुनिक तकनीक न्यायिक प्रणाली को मजबूत बनाने का एक प्रभावी साधन है, लेकिन इसके उपयोग में जवाबदेही, पारदर्शिता और मानवीय निगरानी बनाए रखना अनिवार्य है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय केवल तथ्यों और आंकड़ों का विश्लेषण नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय मूल्यों, सामाजिक संदर्भों और संवेदनशील निर्णयों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

न्यायिक व्यवस्था में AI: अवसर और चुनौतियां

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) द्वारा आयोजित कार्यक्रम का विषय था—“द फ्यूचर ऑफ जस्टिस डिलीवरी: इनोवेशन, इंक्लूजन एंड इंटीग्रिटी”। इस मंच पर न्यायपालिका में तकनीक की बदलती भूमिका और भविष्य की संभावनाओं पर व्यापक चर्चा हुई। अपने संबोधन में CJI सूर्यकांत ने कहा कि AI बड़ी मात्रा में डेटा का विश्लेषण तेज गति से कर सकता है, कानूनी शोध को आसान बना सकता है और न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बना सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी दक्षता और न्यायिक बुद्धिमत्ता (Judicial Intelligence) दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

उनके अनुसार, AI न्यायिक समझ को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी हमेशा मानव न्यायाधीशों की ही होनी चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया में सहानुभूति, नैतिकता और सामाजिक समझ जैसे तत्व ऐसे हैं जिन्हें कोई भी मशीन पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।

पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जैसे-जैसे AI की क्षमताएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे यह सुनिश्चित करना भी जरूरी हो जाता है कि इसका उपयोग पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से किया जाए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों को मानवीय निगरानी के दायरे में रखा जाना चाहिए ताकि निष्पक्षता और न्याय के मूल सिद्धांतों से कोई समझौता न हो। उनका मानना है कि तकनीक का उद्देश्य न्यायिक संस्थाओं को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाना होना चाहिए, न कि मानवीय निर्णय प्रक्रिया को कमजोर करना।

न्याय तक पहुंच को आसान बना रही तकनीक

CJI सूर्यकांत ने यह भी रेखांकित किया कि पिछले दो दशकों में भारतीय न्यायपालिका ने तकनीक के माध्यम से न्याय तक पहुंच को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। ई-कोर्ट्स, डिजिटल फाइलिंग, ऑनलाइन सुनवाई और वर्चुअल कोर्ट जैसी पहलें न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक सुलभ और पारदर्शी बनाने में सहायक रही हैं। 

विशेष रूप से महामारी के दौरान डिजिटल तकनीकों ने न्यायिक कार्यों की निरंतरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। उनके अनुसार, तकनीक का सही उपयोग न्यायिक प्रणाली को अधिक उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाने में मदद कर सकता है।

जाम्बिया सुप्रीम कोर्ट की जज ने भी साझा किए अनुभव

कार्यक्रम में जाम्बिया की सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश Abha Nair Patel ने भी न्याय वितरण प्रणाली के भविष्य पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में अदालतें केस मैनेजमेंट, रिकॉर्ड प्रबंधन और न्याय तक पहुंच बढ़ाने के लिए डिजिटल तकनीकों का उपयोग कर रही हैं। उनके अनुसार, न्याय में अनावश्यक देरी स्वयं अन्याय का एक रूप है, इसलिए तकनीकी नवाचारों का उपयोग न्यायिक दक्षता बढ़ाने के लिए आवश्यक है।

जस्टिस पटेल ने बताया कि जाम्बिया में अदालतों के रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण और वर्चुअल गवाही जैसी व्यवस्थाएं धीरे-धीरे लागू की जा रही हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुई कई डिजिटल पहलें अब स्थायी और प्रभावी न्यायिक उपकरण के रूप में स्वीकार की जा चुकी हैं।

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