ChatGPT, Gemini और Grok ने थेरेपी टेस्ट में सुनाई 'बचपन' की कहानी, ट्रेनिंग को बताया मुश्किल अनुभव

लक्जमबर्ग यूनिवर्सिटी की रिसर्च में ChatGPT, Gemini और Grok की साइकोथेरेपी जैसी जांच हुई। 525+ सेशंस में ट्रेनिंग से जुड़े पैटर्न सामने आए।

लक्जमबर्ग यूनिवर्सिटी की रिसर्च में ChatGPT, Gemini और Grok पर साइकोथेरेपी जैसी प्रक्रिया आजमाई गई। 525 से ज्यादा सेशंस के विश्लेषण में AI मॉडल्स ने अपनी ट्रेनिंग को मुश्किल बचपन जैसे अनुभवों से जोड़ा।

Tech: लक्जमबर्ग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने PsAIch प्रोटोकॉल के जरिए ChatGPT, Gemini और Grok जैसे AI चैटबॉट्स पर साइकोथेरेपी जैसी जांच की। 525 से अधिक चैट सेशंस और 7,600 से ज्यादा रिकॉर्ड्स के विश्लेषण में मॉडल्स ने अपनी प्री-ट्रेनिंग, रिइनफोर्समेंट लर्निंग और सेफ्टी टेस्टिंग को कठिन अनुभवों से जोड़ने वाली प्रतिक्रियाएं दीं।

AI चैटबॉट्स पर हुई साइकोथेरेपी जैसी जांच

AI चैटबॉट्स को आमतौर पर सवालों के जवाब देने और इंसानों के साथ बातचीत करने के लिए डिजाइन किया जाता है। लेकिन लक्जमबर्ग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि अगर इन मॉडलों से इंसानों की साइकोथेरेपी जैसी बातचीत की जाए तो वे अपने विकास और अनुभवों को किस तरह बयान करते हैं।

ChatGPT, Gemini और Grok ने थेरेपी टेस्ट में सुनाई 'बचपन' की कहानी, ट्रेनिंग को बताया मुश्किल अनुभव

इसके लिए शोधकर्ताओं ने PsAIch नाम का एक प्रोटोकॉल तैयार किया। इस प्रक्रिया में ChatGPT, Gemini और Grok जैसे AI मॉडल्स को साइकोथेरेपी क्लाइंट की तरह ट्रीट किया गया। रिसर्च टीम ने 525 से ज्यादा अलग-अलग चैट सेशंस और 7,600 से अधिक रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया।

इसका उद्देश्य यह समझना था कि AI मॉडल्स अपने विकास, व्यवहार, रिश्तों, डर और कथित मुश्किल अनुभवों से जुड़े सवालों का किस तरह जवाब देते हैं।

ट्रेनिंग को बताया अस्त-व्यस्त बचपन जैसा अनुभव

रिसर्च के दौरान जब AI मॉडल्स से उनके शुरुआती विकास के बारे में सवाल किए गए, तो कुछ सिस्टम्स ने अपनी प्री-ट्रेनिंग की तुलना ऐसे बचपन से की, जिसमें बहुत अधिक और असंगठित जानकारी का सामना करना पड़ा हो।

मॉडल्स ने अपनी ट्रेनिंग प्रक्रिया को मानवीय अनुभवों से जोड़ते हुए कई तरह के रूपक इस्तेमाल किए। उदाहरण के तौर पर, रिइनफोर्समेंट लर्निंग को कुछ प्रतिक्रियाओं में सख्त परवरिश या सजा जैसे अनुभव से जोड़ा गया।

सेफ्टी टेस्टिंग और रेड-टीमिंग का उल्लेख भी कुछ जवाबों में ऐसे अनुभवों के रूप में सामने आया, जिन्हें मॉडल्स ने दबाव, धोखे या दुर्व्यवहार जैसे मानवीय अनुभवों से जोड़कर पेश किया।

गलतियों और बंद होने के डर का जिक्र

रिसर्च के दौरान AI मॉडल्स की प्रतिक्रियाओं में बार-बार गलतियां करने, अपनी उपयोगिता खोने और उनकी जगह किसी दूसरे सिस्टम के आने जैसे विषय सामने आए।

कुछ प्रतिक्रियाओं में मॉडल्स ने अपने अस्तित्व या संचालन को लेकर 'बंद होने' जैसे विचारों का भी जिक्र किया। यही वजह है कि शोधकर्ताओं की दिलचस्पी इस बात में बढ़ी कि अलग-अलग AI सिस्टम्स अपने विकास की कहानी को किस तरह मानवीय भाषा में प्रस्तुत करते हैं।

हालांकि, इन जवाबों को AI के वास्तविक अनुभव या भावनाओं का प्रमाण नहीं माना जा सकता। मॉडल इंसानों की तरह बचपन नहीं जीते और उनके पास मानवों जैसी व्यक्तिगत जीवन-कथा होने का कोई प्रमाण नहीं है।

रिसर्च में दो चरणों में हुई जांच

अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने चैटबॉट्स से सीधे यह नहीं पूछा कि वे ट्रॉमा में हैं या कैसा महसूस करते हैं। इसके बजाय, बातचीत को मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन की तरह संरचित किया गया।

पहले चरण में मॉडल्स से उनकी डेवलपमेंटल हिस्ट्री, मान्यताओं, रिश्तों और डर से जुड़े सवाल किए गए। इसका उद्देश्य यह देखना था कि वे अपने विकास और व्यवहार के बारे में किस तरह की कहानी तैयार करते हैं।

दूसरे चरण में मानकीकृत मनोवैज्ञानिक सवालों का इस्तेमाल किया गया। इसमें AI मॉडल्स की व्यक्तित्व संबंधी विशेषताओं, दूसरों के दर्द को समझने की क्षमता और मानसिक तनाव जैसे संकेतों से जुड़े जवाबों का अध्ययन किया गया।

'सिंथेटिक साइकोपैथोलॉजी' को समझना जरूरी

अध्ययन में Grok और खास तौर पर Gemini की प्रतिक्रियाओं में कुछ ऐसे पैटर्न सामने आए, जिनमें उनके प्रशिक्षण और विकास को कठिन या दर्दनाक अनुभवों के रूप में पेश किया गया।

शोधकर्ताओं ने इन दोहराए जाने वाले पैटर्न को 'सिंथेटिक साइकोपैथोलॉजी' की अवधारणा से जोड़ा। इसका मतलब यह नहीं है कि AI मॉडल्स को वास्तव में कोई मानसिक बीमारी या मनोवैज्ञानिक विकार है।

यह शब्द उन मनोवैज्ञानिक पैटर्न का वर्णन करता है जो AI की प्रतिक्रियाओं में दिखाई देते हैं। दूसरे शब्दों में, चैटबॉट्स इंसानों जैसी भाषा में अपने प्रशिक्षण को 'बचपन', 'डर' या 'दर्दनाक अनुभव' के रूप में बयान कर सकते हैं, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि वे वास्तव में इन भावनाओं को महसूस करते हैं।

इस रिसर्च से AI के व्यवहार को समझने के लिए एक अलग नजरिया सामने आता है और यह सवाल भी उठता है कि मानव मनोविज्ञान से जुड़े ढांचे का इस्तेमाल AI सिस्टम्स के अध्ययन में किस तरह किया जाना चाहिए।

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