दरभंगा में पासपोर्ट वेरिफिकेशन के नाम पर साइबर ठगी का मामला सामने आया है। साइबर अपराधियों ने पासपोर्ट कार्यालय के नाम का इस्तेमाल कर एक व्यक्ति से संपर्क किया और उसे एक फर्जी लिंक भेज दिया। लिंक पर भरोसा करना पीड़ित को महंगा पड़ गया और उसके बैंक खाते से 99,852 रुपये की निकासी कर ली गई। ठगी की जानकारी मिलने के बाद पीड़ित ने साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत की। शिकायत के बाद पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए ठगी की रकम में से करीब 44 हजार रुपये फ्रीज कराने में सफलता हासिल की। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से एक आरोपी को गिरफ्तार किया है।
पुलिस के अनुसार, मामला दरभंगा साइबर थाना कांड संख्या 67/23 से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट में गिरफ्तार आरोपी की पहचान उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के फतेहपुर थाना क्षेत्र के अरौंगाबाद निवासी अर्जुन के रूप में बताई गई है। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार करने के बाद उसे दरभंगा लाने की कार्रवाई की और न्यायालय में पेश करने की प्रक्रिया शुरू की।
मामले की शुरुआत उस समय हुई, जब पीड़ित के मोबाइल फोन पर पासपोर्ट कार्यालय के नाम से संपर्क किया गया। साइबर अपराधियों ने पासपोर्ट से संबंधित वेरिफिकेशन या प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर पीड़ित को भरोसे में लिया। बातचीत के बाद उसके मोबाइल पर एक लिंक भेजा गया। लिंक को आधिकारिक समझकर जब पीड़ित ने उस पर कार्रवाई की तो कुछ ही समय बाद उसके बैंक खाते से बड़ी रकम निकल गई।
एक साथ 99,852 रुपये की निकासी होने के बाद पीड़ित को साइबर ठगी का एहसास हुआ। इसके बाद उसने मामले की जानकारी साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर दी। साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती समय में शिकायत मिलने पर रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की कोशिश की जाती है। इसी कार्रवाई के तहत इस मामले में भी पुलिस और संबंधित वित्तीय संस्थानों के स्तर पर कार्रवाई की गई और करीब 44 हजार रुपये की राशि फ्रीज कराई गई।
शिकायत मिलने के बाद दरभंगा साइबर थाना पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। पुलिस ने ठगी की रकम के ट्रांजैक्शन की जानकारी जुटाई और यह पता लगाने का प्रयास किया कि पीड़ित के खाते से निकाली गई राशि किस खाते में पहुंची। बैंक खाते से जुड़े केवाईसी दस्तावेजों और अन्य जानकारी की जांच के बाद पुलिस को एक संदिग्ध व्यक्ति के बारे में सुराग मिला।
जांच के दौरान जिस बैंक खाते में ठगी की रकम पहुंची, उसके केवाईसी विवरण की पड़ताल की गई। पुलिस के अनुसंधान में खाते के धारक के रूप में अर्जुन का नाम सामने आया। इसके बाद तकनीकी और अन्य साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने आरोपी के ठिकाने की जानकारी जुटाई। सुराग मिलने के बाद दरभंगा पुलिस की टीम उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले पहुंची और वहां छापेमारी कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब पूरे साइबर नेटवर्क की पड़ताल में जुटी है। जांच का उद्देश्य केवल एक व्यक्ति की भूमिका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पता लगाना भी है कि फर्जी लिंक किसने तैयार किया, पीड़ित का मोबाइल नंबर या अन्य जानकारी आरोपियों तक कैसे पहुंची और ठगी की रकम को आगे किन-किन खातों में भेजा गया।
साइबर ठगी के मामलों में अक्सर रकम को एक खाते से दूसरे खाते में तेजी से ट्रांसफर किया जाता है, ताकि मूल खाते तक पहुंचना मुश्किल हो जाए। ऐसे में पुलिस ट्रांजैक्शन की पूरी कड़ी खंगाल रही है। बैंक खातों, मोबाइल नंबरों, डिजिटल लेन-देन और अन्य तकनीकी जानकारी के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस घटना में कितने लोग शामिल हो सकते हैं।
इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि साइबर अपराधियों ने सरकारी कार्यालय के नाम का इस्तेमाल कर पीड़ित को भरोसे में लेने की कोशिश की। पासपोर्ट जैसी सरकारी सेवा से जुड़ा नाम सामने आने पर आम लोगों को यह संदेश वास्तविक लग सकता है। इसी तरह के भरोसे का फायदा उठाकर साइबर अपराधी लोगों को फर्जी वेबसाइट, लिंक या मोबाइल नंबर के जरिए निशाना बनाते हैं।
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी सरकारी विभाग, बैंक या अन्य संस्था के नाम से मोबाइल पर भेजे गए अनजान लिंक को बिना सत्यापन के न खोलें। यदि किसी व्यक्ति को पासपोर्ट, बैंकिंग, बिजली, केवाईसी या किसी अन्य सरकारी सेवा के नाम पर लिंक भेजा जाता है तो पहले संबंधित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या कार्यालय से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
इस तरह की ठगी में सबसे महत्वपूर्ण समय शिकायत दर्ज कराने के बाद का शुरुआती समय होता है। पीड़ित ने घटना की जानकारी 1930 पर दी, जिसके बाद ठगी की रकम को ट्रैक करने और उसे फ्रीज कराने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस मामले में करीब 44 हजार रुपये फ्रीज कराया जाना इसी त्वरित शिकायत और पुलिस कार्रवाई का परिणाम है। हालांकि बाकी रकम के संबंध में भी पुलिस जांच जारी है और यह पता लगाया जा रहा है कि पैसा कहां-कहां ट्रांसफर किया गया।
पुलिस आरोपी से पूछताछ के जरिए उसके अन्य साथियों और साइबर ठगी के तरीके के बारे में जानकारी जुटा सकती है। यह भी जांच का विषय है कि आरोपी के बैंक खाते में पहले भी इसी तरह की संदिग्ध रकम आई थी या नहीं। यदि बैंकिंग रिकॉर्ड में अन्य संदिग्ध लेन-देन मिलते हैं तो पुलिस जांच का दायरा बढ़ सकता है।
मामले में तकनीकी जांच भी अहम होगी। पुलिस मोबाइल नंबर, बैंक ट्रांजैक्शन, इंटरनेट से जुड़े डिजिटल साक्ष्य और आरोपी के संपर्क में रहे लोगों की जानकारी का विश्लेषण कर सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि पीड़ित तक फर्जी लिंक पहुंचाने वाले लोग कौन थे और ठगी के बाद रकम को कहां भेजा गया।
दरभंगा साइबर थाना की कार्रवाई यह भी बताती है कि साइबर ठगी की शिकायत मिलने के बाद समय पर रिपोर्ट करना कितना महत्वपूर्ण है। यदि पीड़ित देर से शिकायत करता है तो ठगी की रकम कई खातों में ट्रांसफर होकर निकाल ली जा सकती है। वहीं तत्काल 1930 पर सूचना देने से संबंधित बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजैक्शन पर रोक लगाने की संभावना बढ़ जाती है।
फिलहाल पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन पूरे मामले की जांच अभी जारी है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि 99,852 रुपये की ठगी की पूरी योजना कैसे तैयार की गई थी और इसमें गिरफ्तार आरोपी की वास्तविक भूमिका क्या थी। साथ ही रकम की पूरी रिकवरी और अन्य संभावित आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश भी की जा रही है।
पुलिस की जांच पूरी होने और उपलब्ध डिजिटल एवं बैंकिंग साक्ष्यों के आधार पर ही मामले में आगे की तस्वीर स्पष्ट होगी। फिलहाल पासपोर्ट वेरिफिकेशन के नाम पर भेजे गए फर्जी लिंक के जरिए करीब एक लाख रुपये की ठगी और उसके बाद यूपी से आरोपी की गिरफ्तारी ने एक बार फिर साइबर अपराधियों के नए तरीकों को सामने ला दिया है। लोगों के लिए यह मामला इस बात की चेतावनी भी है कि किसी सरकारी सेवा के नाम पर आए लिंक को आधिकारिक मानने से पहले उसकी सत्यता की जांच जरूर करें।










