दरभंगा में नदी की धारा मोड़ी तो खेतों पर टूटा संकट: 50 एकड़ की धान फसल कटाव की जद में, किसानों की बढ़ी चिंता

दरभंगा में नदी की धारा बदलने से किनारे के खेतों पर कटाव का खतरा बढ़ गया है। करीब 50 एकड़ में लगी धान की फसल इसकी जद में है और किसान चिंतित हैं।
दरभंगा में नदी की धारा मोड़ी तो खेतों पर टूटा संकट: 50 एकड़ की धान फसल कटाव की जद में, किसानों की बढ़ी चिंता
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दरभंगा में नदी की धारा में बदलाव ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। नदी का पानी नए रास्ते की ओर मुड़ने के बाद अब खेतों की तरफ कटाव का खतरा पैदा हो गया है। बताया जा रहा है कि करीब 50 एकड़ में लगी धान की फसल कटाव की जद में आ गई है। किसानों को आशंका है कि अगर नदी की धार इसी तरह खेतों की ओर बनी रही तो बड़ी मात्रा में उपजाऊ जमीन और तैयार होती धान की फसल पानी में समा सकती है।

नदी की धारा बदलने का असर सबसे ज्यादा उन खेतों पर दिखाई दे रहा है, जो नदी के किनारे स्थित हैं। तेज बहाव के कारण मिट्टी लगातार कट रही है। किनारे की जमीन कमजोर होने से खेतों का रकबा धीरे-धीरे नदी की ओर खिसकने लगा है। किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि धान की फसल इस समय खेतों में खड़ी है और कटाव बढ़ने पर उनकी महीनों की मेहनत पानी में बह सकती है।

दरभंगा और आसपास का इलाका कई नदियों से प्रभावित रहा है। यहां नदियों की धाराओं में बदलाव और बाढ़ के दौरान कटाव की समस्या नई नहीं है। कमला समेत क्षेत्र की कई नदियों के प्रवाह में ऐतिहासिक रूप से बदलाव दर्ज किए गए हैं।

किसानों का कहना है कि खेतों में धान की फसल तैयार करने के लिए उन्होंने बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई पर पैसा खर्च किया है। ऐसे में अगर नदी का कटाव खेतों तक पहुंचता है तो उन्हें दोहरा नुकसान होगा। एक तरफ फसल नष्ट होगी और दूसरी तरफ खेती योग्य जमीन भी कम हो सकती है।

स्थानीय किसानों के मुताबिक नदी की धारा बदलने के बाद पानी का दबाव एक तरफ अधिक बढ़ गया है। जिस स्थान पर पहले नदी का बहाव अपेक्षाकृत दूर था, वहां अब पानी की धार खेतों के किनारे तक पहुंच रही है। लगातार पानी के दबाव से मिट्टी का कटाव तेज हो रहा है। कई जगह खेत और नदी के बीच बची जमीन काफी कम हो गई है।

कटाव की स्थिति को लेकर किसानों ने प्रशासन से जल्द हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कटाव रोकने के उपाय नहीं किए गए तो नुकसान का दायरा बढ़ सकता है। किसानों की मांग है कि संबंधित विभाग की टीम मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा ले और जरूरत के अनुसार कटावरोधी कार्य शुरू कराया जाए।

नदी किनारे खेती करने वाले किसानों के लिए इस तरह का कटाव बेहद गंभीर समस्या है। कई परिवारों की आय सीधे कृषि पर निर्भर है। धान की फसल खराब होने का मतलब केवल एक सीजन की कमाई का नुकसान नहीं है, बल्कि अगले सीजन की खेती के लिए जरूरी आर्थिक संसाधनों पर भी असर पड़ सकता है।

कटाव बढ़ने पर खेत की ऊपरी उपजाऊ मिट्टी भी नदी में बह जाती है। इससे जमीन की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। यदि नदी लगातार अपना रास्ता बदलती रहती है तो लंबे समय में कई किसानों की जमीन का स्वरूप भी बदल सकता है। ऐसे में तत्काल राहत के साथ स्थायी कटावरोधी व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही है।

दरभंगा और उत्तर बिहार के नदी क्षेत्रों में पहले भी फसल और जमीन के कटाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। बगहा में गंडक नदी के कटाव से करीब 50 एकड़ में लगी गन्ना और धान की फसल नदी में समा जाने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। किसानों ने उस समय भी कटावरोधी कार्य और मुआवजे की मांग की थी।

किसानों का कहना है कि नदी की धार को लेकर स्थिति लगातार बदल रही है। इसलिए केवल सामान्य निरीक्षण से समस्या का समाधान नहीं होगा। जहां नदी खेतों के करीब पहुंच गई है, वहां तत्काल मिट्टी और पत्थर से सुरक्षा व्यवस्था करने की जरूरत है, ताकि पानी का सीधा दबाव खेतों पर कम किया जा सके।

बारिश के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर कटाव और तेज होने की आशंका रहती है। ऐसे में किसानों की नजर मौसम और नदी के जलस्तर पर भी बनी हुई है। यदि आने वाले दिनों में पानी का बहाव बढ़ता है तो 50 एकड़ से अधिक क्षेत्र प्रभावित होने की आशंका भी पैदा हो सकती है।

किसानों का कहना है कि धान की खेती में उनकी लागत पहले ही बढ़ चुकी है। खाद, बीज, मजदूरी और डीजल की लागत के बाद अगर फसल कटाव में चली जाती है तो आर्थिक नुकसान की भरपाई मुश्किल होगी। इसलिए प्रशासन से मांग की जा रही है कि प्रभावित क्षेत्र का सर्वे कराया जाए और नुकसान की स्थिति में किसानों को नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराई जाए।

नदी के कटाव से निपटने के लिए केवल फसल बचाना ही पर्याप्त नहीं होगा। खेतों के किनारे स्थायी सुरक्षा व्यवस्था, नदी की धारा का तकनीकी अध्ययन और कमजोर हिस्सों की निगरानी भी जरूरी होगी। यदि किसी स्थान पर नदी का बहाव लगातार उसी दिशा में बना रहता है तो भविष्य में वहां कटाव की समस्या और गंभीर हो सकती है।

किसानों के मुताबिक सबसे जरूरी कदम यह है कि विभागीय अधिकारी मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखें। कागजी रिपोर्ट के बजाय खेतों तक पहुंचकर यह पता लगाना जरूरी है कि कितनी जमीन कटाव की चपेट में है और किन हिस्सों में तत्काल सुरक्षा कार्य की जरूरत है।

अगर समय रहते कटाव पर नियंत्रण पा लिया जाता है तो खड़ी धान की फसल को बचाने के साथ-साथ किसानों की जमीन को भी सुरक्षित किया जा सकता है। वहीं देरी होने पर नदी की धारा और ज्यादा जमीन को अपने साथ बहा सकती है।

फिलहाल करीब 50 एकड़ धान की फसल पर मंडरा रहे कटाव के खतरे ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसान प्रशासन से जल्द राहत और स्थायी समाधान की उम्मीद कर रहे हैं। उनकी नजर अब इस बात पर है कि संबंधित विभाग की टीम कब मौके पर पहुंचती है और कटाव रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

कुल मिलाकर, दरभंगा में नदी की बदली धारा ने किसानों के सामने नई मुश्किल खड़ी कर दी है। करीब 50 एकड़ में लगी धान की फसल कटाव की जद में बताई जा रही है। पानी का दबाव बढ़ने से खेतों की मिट्टी कट रही है और किसानों को फसल के साथ जमीन गंवाने का भी डर है। किसानों ने प्रशासन से तत्काल निरीक्षण, कटावरोधी कार्य और नुकसान की स्थिति में उचित सहायता की मांग की है।

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