ESR (Erythrocyte Sedimentation Rate) टेस्ट खून में रेड ब्लड सेल्स के बैठने की गति को मापता है और शरीर में सूजन या संक्रमण का शुरुआती संकेत देता है। यह किसी बीमारी की पुष्टि नहीं करता, लेकिन डॉक्टरों को आगे की जांच और इलाज के लिए दिशा देता है। बढ़ा हुआ ESR शरीर में इंफेक्शन, ऑटोइम्यून रोग या टिश्यू डैमेज का संकेत हो सकता है।
ESR Test: खून की जांच के जरिए शरीर में सूजन और संक्रमण का पता लगाने के लिए ESR (Erythrocyte Sedimentation Rate) टेस्ट अहम है। दिल्ली के पूर्व रेडियोलॉजिस्ट डॉ. सुन्नकर दत्त के अनुसार, यह टेस्ट लंबी अवधि के बुखार, जोड़ों में दर्द या कमजोरी जैसी समस्याओं के दौरान किया जाता है। टेस्ट में खून के सैंपल को एक घंटे के लिए ट्यूब में रखा जाता है और देखा जाता है कि रेड ब्लड सेल्स कितनी तेजी से नीचे बैठते हैं। इससे डॉक्टर यह तय कर सकते हैं कि आगे कौन सी मेडिकल जांच या उपचार जरूरी है।
ESR टेस्ट क्यों जरूरी है
ESR (Erythrocyte Sedimentation Rate) टेस्ट खून में रेड ब्लड सेल्स के नीचे बैठने की गति मापता है और शरीर में चल रही सूजन या संक्रमण का संकेत देता है। दिल्ली एम्स के पूर्व रेडियोलॉजिस्ट डॉ. सुन्नकर दत्त बताते हैं कि यह टेस्ट खासकर लंबी अवधि के बुखार, जोड़ों में दर्द या कमजोरी जैसी समस्याओं में प्रारंभिक जांच के लिए किया जाता है। ESR बढ़ा हुआ होना शरीर में संक्रमण, टिश्यू डैमेज या ऑटोइम्यून बीमारी का संकेत हो सकता है।
ESR टेस्ट किसी बीमारी की पुष्टि नहीं करता, बल्कि डॉक्टर को यह दिशा देता है कि आगे कौन सी जांच जरूरी है। सामान्य रूप से ESR कम होना खतरे की निशानी नहीं होता, लेकिन कभी-कभी यह डिहाइड्रेशन या दवाओं के प्रभाव से कम भी दिख सकता है।

ESR टेस्ट कैसे किया जाता है
टेस्ट के लिए खून का सैंपल लंबी पतली ट्यूब में रखा जाता है और एक घंटे तक स्थिर रहने दिया जाता है। इस दौरान देखा जाता है कि रेड ब्लड सेल्स कितनी तेजी से नीचे बैठते हैं। जितनी तेजी से ये नीचे बैठते हैं, ESR उतना अधिक माना जाता है।
डॉ. दत्त के अनुसार, ESR का स्तर बढ़ने पर शरीर में सूजन या संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है, जिससे थकान, बुखार और जोड़ों में दर्द जैसे लक्षण उभर सकते हैं। वहीं, कम ESR आम तौर पर सामान्य होता है।
टेस्ट से पहले और बाद में ध्यान देने योग्य बातें
ESR टेस्ट से पहले अपने डॉक्टर को किसी दवा के सेवन की जानकारी दें। टेस्ट खाली पेट या डॉक्टर के बताए अनुसार ही करवाएं। अत्यधिक थकान या तनाव से बचें और रिपोर्ट की तुलना हमेशा विशेषज्ञ से करवाएं। बार-बार टेस्ट की जरूरत होने पर दो टेस्ट के बीच पर्याप्त अंतर रखें।











