इसरो 30 अक्टूबर 2026 को श्रीहरिकोटा से NVS-03 सैटेलाइट लॉन्च करेगा। रात 11:51 बजे इसे GSLV-F18 रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी है। इस सैटेलाइट के काम शुरू करने से भारत की अपनी नेविगेशन सेवा NavIC को मजबूती मिलेगी।
ISRO NVS-03 Launch: भारत अब अपनी सैटेलाइट नेविगेशन सेवा को और बेहतर करने में जुटा है। इसी सिलसिले में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) शुक्रवार को NVS-03 सैटेलाइट लॉन्च करने जा रहा है। इसकी तैयारी आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में चल रही है। इसरो ने बुधवार, 28 अक्टूबर को लॉन्चिंग की जानकारी दी थी।
नया सैटेलाइट NavIC सिस्टम से जुड़ेगा। यह वही सिस्टम है, जिसे भारत ने अपनी जरूरतों के हिसाब से तैयार किया है। इससे किसी जगह की सही लोकेशन और समय का पता लगाने में मदद मिलती है।
रात 11:51 बजे श्रीहरिकोटा से रवाना होगा रॉकेट
NVS-03 को अंतरिक्ष में पहुंचाने की जिम्मेदारी GSLV-F18 रॉकेट को दी गई है। शुक्रवार रात 11 बजकर 51 मिनट पर इसे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से छोड़ा जाएगा। GSLV की यह 20वीं उड़ान होगी। इस बार रॉकेट करीब 2,250 किलो वजनी सैटेलाइट लेकर जाएगा। रॉकेट सैटेलाइट को पहले अंतरिक्ष की शुरुआती कक्षा में छोड़ेगा। इसके बाद सैटेलाइट में लगे इंजन की मदद से उसे उस कक्षा तक पहुंचाया जाएगा, जहां उसे रहकर काम करना है।
सैटेलाइट अपनी जगह पहुंच गया तो इसरो के वैज्ञानिक उसके उपकरणों और सिग्नल की जांच करेंगे। इससे पता चलेगा कि वह जमीन पर मौजूद केंद्रों से सही संपर्क बना पा रहा है या नहीं। इन जांचों के बाद ही उसे नेविगेशन सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।
NVS-03 सैटेलाइट में क्या-क्या खास है?
NVS-03 नई पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट की सीरीज का तीसरा उपग्रह है। इसे पुराने सैटेलाइट की सेवाएं जारी रखने और NavIC को मजबूत बनाने के लिए तैयार किया गया है। इसमें बेहद सटीक समय बताने वाली एटॉमिक घड़ियां लगाई गई हैं। इनमें एक घड़ी भारत में ही बनाई गई है। इन घड़ियों का काम समय की बिल्कुल सही जानकारी देना है। दरअसल, मोबाइल या किसी दूसरे उपकरण पर लोकेशन पता करने के लिए सैटेलाइट से मिलने वाले सिग्नल का समय बहुत मायने रखता है।
नए सैटेलाइट में L1 सिग्नल की सुविधा भी मिलेगी। इससे आगे चलकर ज्यादा मोबाइल फोन और दूसरे उपकरण NavIC सेवा से जुड़ सकेंगे। हालांकि, इसके लिए उन उपकरणों में भी NavIC सिग्नल लेने की सुविधा होना जरूरी है।
क्या है NavIC, क्या यह GPS की तरह काम करता है?
NavIC भारत की अपनी सैटेलाइट नेविगेशन सेवा है। इसका पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। इसे इसरो ने विकसित किया है। आसान भाषा में समझें तो जब हम मोबाइल पर किसी जगह का रास्ता देखते हैं या अपनी लोकेशन पता करते हैं, तो उसमें सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी काम आती है।
अमेरिका का GPS भी इसी तरह काम करता है। फर्क यह है कि GPS दुनिया भर के लिए बना है, जबकि NavIC मुख्य रूप से भारत और उसके आसपास के इलाकों के लिए तैयार किया गया है। NavIC का दायरा भारत के साथ देश की सीमाओं से करीब 1,500 किलोमीटर दूर तक है। इसका इस्तेमाल गाड़ियों को रास्ता बताने, समुद्री जहाजों की आवाजाही और हवाई सेवाओं में किया जा सकता है। बाढ़, तूफान या किसी दूसरी आपदा के दौरान भी सही लोकेशन की जानकारी काफी काम आ सकती है।
भारतीय सेना के लिए कितना काम आएगा NavIC?
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सेना के लिए किसी भी जगह की सही लोकेशन मिलना बहुत जरूरी है। खासकर जब जवान किसी मुश्किल इलाके में हों या नौसेना के जहाज समुद्र में गश्त कर रहे हों। ऐसे समय में सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी काम आती है। NavIC के जरिए भारत अपनी इसी सुविधा को बेहतर करना चाहता है। फिलहाल भारत कुछ जरूरतों के लिए विदेशी नेविगेशन सिस्टम का भी सहारा लेता है।
अपनी सेवा मजबूत होने पर दूसरे देशों के सिस्टम पर निर्भरता घटेगी। हालांकि, NavIC का पूरा फायदा तभी मिलेगा, जब इसके सैटेलाइट बिना किसी रुकावट के काम करेंगे।
NVS-02 को लॉन्च करने के बाद क्या हुआ था?
29 जनवरी 2025 को इसरो ने NVS-02 को अंतरिक्ष में भेजा था। लॉन्चिंग के दौरान सब ठीक रहा और रॉकेट ने अपना काम पूरा कर दिया। परेशानी तब शुरू हुई, जब सैटेलाइट को उसकी तय कक्षा में पहुंचाने की बारी आई। इसके लिए सैटेलाइट का इंजन चालू होना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। बाद में जांच हुई तो पता चला कि इंजन से जुड़े एक वाल्व को जरूरी सिग्नल ही नहीं मिला था। इसी खराबी के चलते सैटेलाइट को तय कक्षा में नहीं पहुंचाया जा सका। इसरो ने मामले की जांच की और तकनीकी खामी दूर करने के लिए कदम उठाए।
NVS-03 से इसरो को क्या उम्मीद है?
NavIC के लिए पहले भेजे गए कुछ सैटेलाइट अब पुराने हो चुके हैं। कुछ ने अपनी तय समय सीमा पूरी कर ली है, तो कुछ में खराबी आने से उनका काम प्रभावित हुआ है। ऐसे में इसरो के सामने नेविगेशन सेवा को बेहतर बनाए रखने की चुनौती है। इसी कमी को दूर करने के लिए NVS-03 को अहम माना जा रहा है। इसरो की कोशिश है कि नया सैटेलाइट अपनी तय कक्षा में पहुंचे और वहां से सही तरीके से काम शुरू करे।
30 अक्टूबर को होने वाले इस मिशन पर इसलिए भी नजर रहेगी, क्योंकि पिछली बार सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के बाद दिक्कत आई थी। इस बार देखना होगा कि लॉन्चिंग के बाद सैटेलाइट अपनी सही जगह तक पहुंच पाता है या नहीं। सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो भारत की NavIC सेवा को और मजबूत करने में मदद मिल सकती है।









