झारखंड में उर्दू को राजभाषा का दर्जा हासिल है, लेकिन सरकारी स्कूलों में उर्दू शिक्षा की स्थिति लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। राज्य में उर्दू पढ़ाने के लिए स्वीकृत शिक्षक पदों का बड़ा हिस्सा लंबे समय से खाली पड़ा है। इसका सीधा असर उन विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है, जिन्होंने स्कूलों में उर्दू को विषय के तौर पर चुना है। ताजा रिपोर्ट में एक बार फिर इस विरोधाभास को सामने रखा गया है कि भाषा को सरकारी स्तर पर मान्यता मिलने के बावजूद उसके शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है।
झारखंड में उर्दू शिक्षकों की कमी कोई हाल की समस्या नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक प्राथमिक और मध्य विद्यालय स्तर पर उर्दू शिक्षकों के कुल 4,401 स्वीकृत पद हैं, लेकिन इनमें बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। 2023 की रिपोर्टिंग में बताया गया था कि राज्य गठन के बाद उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति बेहद सीमित रही और 4,401 पदों में से करीब 3,708 पद खाली थे, जबकि केवल 689 शिक्षक कार्यरत बताए गए थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उर्दू शिक्षा के लिए स्वीकृत ढांचे और जमीनी स्तर पर उपलब्ध शिक्षकों के बीच कितना बड़ा अंतर रहा है।
उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति का यह संकट उस समय और गंभीर दिखाई देता है, जब झारखंड में उर्दू को राजभाषा के रूप में स्थान प्राप्त है। किसी भाषा को राजकीय मान्यता मिलने का उद्देश्य केवल सरकारी कामकाज तक उसकी मौजूदगी सीमित रखना नहीं होता, बल्कि उसके विकास, संरक्षण और शिक्षा में उपयोग के लिए भी संस्थागत व्यवस्था तैयार करना होता है। लेकिन स्कूलों में शिक्षकों के पद खाली रहने से भाषा सीखने वाले विद्यार्थियों को नियमित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण उपलब्ध कराना मुश्किल हो जाता है।
इस समस्या का असर सबसे पहले विद्यार्थियों पर पड़ता है। जिन सरकारी स्कूलों में उर्दू विषय पढ़ाया जाना है, वहां यदि पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं तो विद्यार्थियों को विषय की नियमित कक्षाएं नहीं मिल पातीं। कई जगह दूसरे विषयों के शिक्षक व्यवस्था संभालते हैं या विद्यार्थियों को खुद अध्ययन पर निर्भर रहना पड़ता है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बनी रहने पर विद्यार्थियों की भाषा दक्षता, परीक्षा परिणाम और उच्च शिक्षा में आगे बढ़ने के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं।
झारखंड में उर्दू शिक्षकों के पदों को लेकर पहले भी विवाद सामने आता रहा है। जनवरी 2024 में प्राथमिक विद्यालयों में उर्दू शिक्षकों के पदों को समाप्त या मरणशील संवर्ग में डालने के मुद्दे पर शिक्षक संगठनों ने विरोध जताया था। शिक्षक संघ का कहना था कि राज्य गठन के समय उर्दू शिक्षकों के 4,401 पद थे, लेकिन इनमें से केवल 689 पदों पर नियुक्ति हो सकी थी और रिक्त पदों को भरने के बजाय पद समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही थी।
इसी मुद्दे के बीच सरकार की ओर से उर्दू शिक्षकों के नए पद सृजित करने की प्रक्रिया की जानकारी भी सामने आई थी। जनवरी 2024 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में उर्दू के सहायक शिक्षकों के लिए 4,401 पदों को लेकर नियुक्ति की दिशा में पहल की गई थी और मुख्यमंत्री स्तर से नए पदों को लेकर स्वीकृति की बात कही गई थी।
लेकिन पद स्वीकृत होने और वास्तविक नियुक्ति होने के बीच का अंतर अभी भी बड़ी समस्या बना हुआ है। सरकारी शिक्षा व्यवस्था में केवल पदों की संख्या तय कर देना पर्याप्त नहीं होता। उन पदों पर भर्ती प्रक्रिया पूरी करना, योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति करना और उन्हें विद्यालयों में पदस्थापित करना भी उतना ही जरूरी है। जब तक यह प्रक्रिया जमीन पर पूरी नहीं होती, तब तक विद्यार्थियों को शिक्षक उपलब्ध कराने की समस्या बनी रहती है।
उर्दू शिक्षा को लेकर एक और चुनौती यह है कि अलग-अलग स्तर के स्कूलों में शिक्षक उपलब्धता का आंकड़ा एक जैसा नहीं है। कहीं स्वीकृत पद हैं लेकिन शिक्षक नहीं हैं, तो कहीं विद्यार्थियों की संख्या के अनुरूप पदस्थापन नहीं हो पाता। इससे शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन पैदा होता है। झारखंड के हाईस्कूल और प्लस टू विद्यालयों में भी शिक्षकों की कमी और जरूरत के हिसाब से पदस्थापन नहीं होने की समस्या पर हाल में रिपोर्ट सामने आई है।
उर्दू शिक्षकों की कमी का मामला केवल रोजगार से जुड़ा विषय नहीं है। यह सीधे तौर पर भाषा और शिक्षा के अधिकार से जुड़ता है। जिस विद्यार्थी ने अपने विद्यालय में उर्दू को विषय के रूप में चुना है, उसके लिए योग्य शिक्षक की उपलब्धता शिक्षा की बुनियादी जरूरत है। शिक्षक के अभाव में सिर्फ किताब और पाठ्यक्रम उपलब्ध होने से भाषा की प्रभावी पढ़ाई संभव नहीं है।
राज्य में उर्दू शिक्षा के पुराने इतिहास को देखें तो एकीकृत बिहार के समय से ही कई प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में उर्दू पढ़ाने की व्यवस्था रही है। झारखंड बनने के बाद भी यह व्यवस्था जारी रही, लेकिन शिक्षकों की नियमित नियुक्ति और रिक्त पदों को भरने का मुद्दा लगातार उठता रहा है। 2023 की रिपोर्टों में यह भी सामने आया था कि राज्य गठन के बाद उर्दू शिक्षकों की नियमित बहाली बेहद सीमित रही।
इसका असर उन स्कूलों पर भी पड़ता है जहां उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या पर्याप्त है। यदि किसी विद्यालय में बड़ी संख्या में विद्यार्थी उर्दू विषय लेना चाहते हैं, लेकिन वहां शिक्षक का पद खाली है, तो शिक्षा विभाग के सामने तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत होती है। इसके लिए शिक्षक की प्रतिनियुक्ति, नई नियुक्ति या आसपास के विद्यालयों से संसाधन साझा करने जैसी व्यवस्थाएं की जा सकती हैं, लेकिन लंबे समय के समाधान के लिए नियमित नियुक्ति जरूरी होगी।
उर्दू शिक्षा के लिए सिर्फ प्राथमिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर भी पर्याप्त शिक्षकों की आवश्यकता है। विद्यार्थी जब प्राथमिक कक्षाओं से आगे बढ़ते हैं तो भाषा के साथ साहित्य, व्याकरण और अन्य विषयगत ज्ञान की जरूरत बढ़ती जाती है। ऐसे में शिक्षक की कमी का असर आगे की कक्षाओं में और ज्यादा महसूस हो सकता है।
झारखंड सरकार के शिक्षा विभाग की मौजूदा गतिविधियों में शिक्षक नियुक्ति और काउंसलिंग से जुड़ी प्रक्रियाएं जारी हैं। विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर 2026 में माध्यमिक आचार्य से संबंधित काउंसलिंग की सूचनाएं भी जारी की गई हैं। इससे यह स्पष्ट है कि राज्य में शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया अलग-अलग स्तरों पर चल रही है, लेकिन उर्दू शिक्षकों के पुराने रिक्त पदों का सवाल अपनी अलग गंभीरता रखता है।
उर्दू को सरकारी मान्यता मिलने के बावजूद अगर स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, तो यह भाषा नीति और शिक्षा नीति के बीच एक बड़ा अंतर दर्शाता है। एक तरफ सरकार भाषाओं को संरक्षण और सम्मान देने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ संबंधित विषय के शिक्षकों के पद वर्षों तक खाली रहते हैं। इससे भाषा के प्रति विद्यार्थियों और अभिभावकों का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है।
शिक्षक संगठनों की ओर से समय-समय पर रिक्त पदों को भरने और उर्दू शिक्षकों के पदों को समाप्त नहीं करने की मांग उठती रही है। उनका तर्क है कि यदि पद पहले से स्वीकृत हैं और विद्यार्थियों को उर्दू पढ़नी है तो उन पदों को खत्म करने के बजाय योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति की जानी चाहिए। 2024 में भी शिक्षक संगठन ने पद समाप्त करने की प्रक्रिया के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी थी।
उर्दू शिक्षा की बदहाली का एक पहलू यह भी है कि शिक्षक की कमी के कारण कई स्कूलों में विषय की पढ़ाई औपचारिकता बनकर रह जाने का खतरा रहता है। विद्यार्थियों के लिए भाषा सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम नियमित कक्षा, शिक्षक का मार्गदर्शन और अभ्यास है। यदि इनमें से कोई एक महत्वपूर्ण कड़ी लंबे समय तक गायब रहे तो भाषा शिक्षा का उद्देश्य पूरा करना कठिन हो जाता है।
विशेषज्ञों और शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मातृभाषा या पसंदीदा भाषा में शिक्षा विद्यार्थियों के सीखने की प्रक्रिया को आसान बनाती है। ऐसे में उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों को पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराना केवल किसी एक समुदाय की मांग के तौर पर नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाना चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्षों से खाली पड़े उर्दू शिक्षक पदों को भरने के लिए सरकार किस समयबद्ध योजना के साथ आगे बढ़ती है। यदि रिक्त पदों की वास्तविक संख्या, स्कूलवार विद्यार्थियों की संख्या और जरूरत का आकलन कर भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है, तो इससे समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। इसके साथ यह भी जरूरी होगा कि नियुक्त शिक्षकों का पदस्थापन उन्हीं विद्यालयों में किया जाए जहां वास्तव में उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों की जरूरत है।
झारखंड में उर्दू शिक्षा की मौजूदा तस्वीर एक बड़े विरोधाभास को सामने रखती है। भाषा को राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है, उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थी मौजूद हैं और शिक्षक पदों का ढांचा भी बनाया गया है, लेकिन बड़ी संख्या में पद खाली रहने से पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ रही है।
ऐसे में उर्दू शिक्षा को मजबूत करने के लिए सिर्फ घोषणाओं से आगे बढ़कर नियुक्ति, पदस्थापन और नियमित निगरानी की जरूरत है। जब तक स्कूलों में पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षक नहीं पहुंचते, तब तक राजभाषा का दर्जा और सरकारी नीतियां विद्यार्थियों के लिए वास्तविक शैक्षिक लाभ में पूरी तरह तब्दील नहीं हो पाएंगी। झारखंड में उर्दू शिक्षा का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि रिक्त पदों और वर्षों से चले आ रहे नियुक्ति संकट का समाधान कितनी तेजी से किया जाता है।









