जिम्बाब्वे में राष्ट्रपति चुनाव खत्म करने वाला बिल निचले सदन से पारित

जिम्बाब्वे की संसद ने राष्ट्रपति कार्यकाल 5 से 7 साल करने और प्रत्यक्ष चुनाव खत्म करने वाला बिल पास। राष्ट्रपति एमर्सन मनांगाग्वा 2030 तक सत्ता में रह सकते हैं।

जिम्बाब्वे की निचली संसद ने राष्ट्रपति कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 7 साल करने वाला संविधान संशोधन बिल पास कर दिया। बिल लागू होने पर राष्ट्रपति एमर्सन मनांगाग्वा 2030 तक पद पर बने रह सकेंगे, जबकि प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनाव भी समाप्त हो जाएंगे।

हरारे: जिम्बाब्वे की राजनीति में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद मोड़ तब आया जब देश की संसद के निचले सदन ने एक संवैधानिक संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी। इस प्रस्तावित कानून के तहत राष्ट्रपति और संसद का कार्यकाल पांच वर्ष से बढ़ाकर सात वर्ष किया जाएगा। यदि यह विधेयक कानून बन जाता है, तो राष्ट्रपति एमर्सन मनांगाग्वा 2028 के बजाय 2030 तक सत्ता में बने रह सकेंगे।

इस कदम ने देश के राजनीतिक भविष्य, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है। समर्थकों का कहना है कि यह बदलाव राजनीतिक स्थिरता और नीति निरंतरता सुनिश्चित करेगा, जबकि आलोचकों का मानना है कि इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर हो सकती है।

संसद में दो-तिहाई बहुमत से पारित हुआ विधेयक

गुरुवार को हुए मतदान में 216 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया, जबकि 42 सांसदों ने इसका विरोध किया। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से अधिक समर्थन मिलने के बाद विधेयक आसानी से पारित हो गया।

संसद के अध्यक्ष ने मतदान परिणामों की घोषणा करते हुए बताया कि संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक समर्थन संख्या 187 थी, जिसे विधेयक ने आराम से पार कर लिया। अब यह प्रस्ताव सीनेट के पास जाएगा, जहां इसके पारित होने की भी व्यापक संभावना जताई जा रही है।

सीनेट की मंजूरी मिलने के बाद यह विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा और उसके बाद यह कानून का रूप ले सकता है।

राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव

प्रस्तावित संशोधन का सबसे चर्चित पहलू राष्ट्रपति चुनाव की मौजूदा प्रणाली को समाप्त करना है। यदि नया कानून लागू होता है, तो जिम्बाब्वे में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं किया जाएगा।

इसके बजाय, संसद के सदस्य देश के अगले राष्ट्रपति का चुनाव करेंगे। यह बदलाव जिम्बाब्वे की राजनीतिक व्यवस्था में एक बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है, क्योंकि 1990 के दशक से देश में राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से होता रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह बदलाव सत्ता संरचना और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा दोनों को प्रभावित कर सकता है।

2028 के चुनाव भी 2030 तक टल सकते हैं

संशोधन के अनुसार, राष्ट्रपति और संसद दोनों का कार्यकाल सात वर्ष का होगा। इसके साथ ही 2028 में प्रस्तावित संसदीय चुनावों को भी दो वर्ष के लिए स्थगित कर 2030 में कराने का प्रावधान शामिल है।

इसका अर्थ है कि वर्तमान संसद और वर्तमान राष्ट्रपति दोनों अपने कार्यकाल में अतिरिक्त दो वर्ष प्राप्त करेंगे। यही प्रावधान विपक्षी दलों और नागरिक समाज संगठनों की सबसे बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है।

आलोचकों का कहना है कि इससे मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर देर से मिलेगा।

मनांगाग्वा के राजनीतिक सफर का नया अध्याय

Emmerson Mnangagwa ने 2017 में सत्ता संभाली थी, जब लंबे समय तक देश पर शासन करने वाले Robert Mugabe को सैन्य समर्थन प्राप्त राजनीतिक परिवर्तन के बाद पद छोड़ना पड़ा था।

इसके बाद मनांगाग्वा ने 2018 और 2023 के राष्ट्रपति चुनावों में जीत हासिल की। हालांकि दोनों चुनावों को लेकर विपक्ष और कुछ अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने निष्पक्षता संबंधी सवाल उठाए थे।

शुरुआत में उन्हें आर्थिक सुधार और लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण की उम्मीद के रूप में देखा गया था, लेकिन समय के साथ उनकी सरकार को आर्थिक चुनौतियों, मुद्रास्फीति और राजनीतिक असंतोष का सामना करना पड़ा।

जिम्बाब्वे में राष्ट्रपति चुनाव खत्म करने वाला बिल निचले सदन से पारित

सत्तारूढ़ दल का लंबे समय से चल रहा अभियान

यह संवैधानिक संशोधन अचानक सामने नहीं आया है। सत्तारूढ़ ZANU-PF पार्टी कई महीनों से इस बदलाव के लिए समर्थन जुटा रही थी।

फरवरी में जिम्बाब्वे की कैबिनेट ने इस योजना को मंजूरी दी थी, जिसके बाद इसे संसद में प्रस्तुत किया गया। पार्टी नेताओं का तर्क है कि लंबे कार्यकाल से सरकार को विकास योजनाओं को लागू करने और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।

समर्थकों का कहना है कि बार-बार चुनाव होने से संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है।

विपक्ष और नागरिक संगठनों का विरोध

विपक्षी दलों, संवैधानिक विशेषज्ञों और नागरिक समाज संगठनों ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि संविधान में इतने बड़े बदलाव केवल संसद के माध्यम से नहीं किए जाने चाहिए।

उनका तर्क है कि राष्ट्रपति कार्यकाल बढ़ाने और चुनावी प्रणाली बदलने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर राष्ट्रीय जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए, ताकि नागरिक सीधे अपनी राय दे सकें।

कई कानूनी विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की भागीदारी सर्वोच्च होनी चाहिए और ऐसे मामलों में व्यापक सार्वजनिक सहमति आवश्यक है।

2013 के संविधान से टकराव की बहस

जिम्बाब्वे ने 2013 में नया संविधान अपनाया था, जिसमें राष्ट्रपति को अधिकतम दो कार्यकाल तक सीमित किया गया था। संविधान में यह भी उल्लेख किया गया था कि कार्यकाल बढ़ाने जैसे बदलावों को जनमत संग्रह के माध्यम से मंजूरी मिलनी चाहिए।

कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संशोधन प्रस्ताव उन सिद्धांतों की भावना के विपरीत है, जिनके आधार पर 2013 का संविधान बनाया गया था।

हालांकि सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार प्राप्त है और मौजूदा प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी है।

अदालत ने चुनौती खारिज की

विधेयक पर मतदान से एक दिन पहले जिम्बाब्वे की संवैधानिक अदालत ने उस कानूनी याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें संसद को इस संशोधन पर आगे बढ़ने से रोकने की मांग की गई थी।

अदालत के इस फैसले ने सरकार के लिए रास्ता आसान कर दिया और अगले ही दिन संसद में विधेयक को आवश्यक समर्थन मिल गया।

इस निर्णय के बाद विपक्षी दलों के सामने कानूनी विकल्प सीमित होते दिखाई दे रहे हैं, हालांकि वे राजनीतिक और जन अभियान जारी रखने की बात कह रहे हैं।

जिम्बाब्वे के लोकतांत्रिक भविष्य पर उठे सवाल

नए संवैधानिक संशोधन ने जिम्बाब्वे के लोकतांत्रिक भविष्य को लेकर गंभीर बहस शुरू कर दी है। समर्थकों के अनुसार यह कदम शासन में निरंतरता और स्थिरता सुनिश्चित करेगा, जबकि विरोधियों का मानना है कि इससे सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक पर्यवेक्षक भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसका प्रभाव केवल जिम्बाब्वे की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे दक्षिणी अफ्रीका क्षेत्र की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर भी पड़ सकता है।

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