मुजफ्फरपुर में फर्जी पेमेंट रसीद से ठगी का खुलासा, मास्टरमाइंड समेत तीन गिरफ्तार

मुजफ्फरपुर में फर्जी पेमेंट रसीद दिखाकर 210 मोबाइल फोल्डर की डिलीवरी लेने वाले गिरोह का पर्दाफाश हुआ। पुलिस ने मास्टरमाइंड समेत तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया।
मुजफ्फरपुर में फर्जी पेमेंट रसीद से ठगी का खुलासा, मास्टरमाइंड समेत तीन गिरफ्तार
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मुजफ्फरपुर में फर्जी पेमेंट रसीद दिखाकर कारोबारियों से सामान हासिल करने वाले अंतरजिला साइबर अपराधी गिरोह का पुलिस ने पर्दाफाश किया है। साइबर थाना पुलिस ने इस मामले में गिरोह के कथित मास्टरमाइंड समेत तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपित ऑनलाइन बातचीत के जरिए कारोबारियों से सामान का ऑर्डर करते थे और भुगतान किए बिना ही फर्जी ट्रांजेक्शन रसीद या स्क्रीनशॉट भेजकर यह भरोसा दिलाते थे कि रकम उनके खाते में पहुंच गई है। व्यापारी जब तक बैंक खाते का स्टेटमेंट चेक करता, तब तक सामान डिलीवरी के जरिए आरोपितों तक पहुंच चुका होता था।

पुलिस के मुताबिक, यह मामला 19 सितंबर को मुजफ्फरपुर साइबर थाने में सामने आया। 'क्राउन फोल्डर' नामक दुकान के संचालक भाग्य भूषण ने पुलिस को लिखित शिकायत दी थी। शिकायत के अनुसार, कुछ अज्ञात लोगों ने उनके व्हाट्सएप नंबर पर संपर्क किया और मोबाइल फोल्डर खरीदने का ऑर्डर दिया। आरोपितों ने बातचीत के दौरान ऐसा माहौल बनाया कि कारोबारी को लेन-देन सामान्य होने का भरोसा हो गया। इसके बाद फर्जी भुगतान रसीद दिखाकर सामान की डिलीवरी ले ली गई।

पुलिस की जांच में सामने आया कि आरोपितों ने 15 सितंबर को 43 हजार रुपये और 16 सितंबर को 77,314 रुपये के भुगतान की फर्जी रसीद दिखाई थी। दोनों लेन-देन को जोड़ने पर कुल रकम 1,20,314 रुपये बताई गई है। इन्हीं फर्जी भुगतान रसीदों के आधार पर आरोपितों ने रैपिडो डिलीवरी कूरियर के माध्यम से कांटी स्थित छिन्नमस्तिका मंदिर के पास कुल 210 मोबाइल फोल्डर मंगवा लिए। बाद में जब दुकान संचालक ने अपने बैंक खाते का स्टेटमेंट देखा तो पता चला कि बताई गई रकम वास्तव में खाते में जमा ही नहीं हुई थी। इसके बाद मामले की शिकायत पुलिस से की गई।

घटना की जानकारी मिलने के बाद मुजफ्फरपुर एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा के निर्देश पर साइबर डीएसपी हिमांशु कुमार के नेतृत्व में विशेष टीम गठित की गई। पुलिस टीम ने तकनीकी साक्ष्यों के साथ मानवीय सूचना को भी जांच में शामिल किया। पुलिस का कहना है कि तेजी से की गई जांच के दौरान आरोपितों की पहचान हुई और करीब आठ घंटे के भीतर मुख्य आरोपित मनीष कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके पास से ठगी में इस्तेमाल किए गए दो मोबाइल फोन भी बरामद किए गए।

पुलिस के अनुसार, पूछताछ और जांच के आधार पर मामले में आगे की कड़ियां सामने आईं। मुख्य आरोपित मनीष कुमार की निशानदेही पर पुलिस ने उस व्यक्ति तक पहुंच बनाई, जिसने रैपिडो के माध्यम से सामान की डिलीवरी प्राप्त की थी। पुलिस ने मोतीपुर निवासी रिमझिम कुमार को गिरफ्तार किया। उसके पास से घटना में इस्तेमाल की गई बाइक और मोबाइल फोन बरामद किए जाने की बात पुलिस ने कही है। इसके बाद पुलिस ने सामान को आगे खपाने या खरीदने वाले व्यक्ति की भूमिका की भी जांच की।

जांच के दौरान पुलिस ने राजेपुर के मोबाइल दुकान संचालक मो. परवेज आलम को भी गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, वह कथित तौर पर चोरी और ठगी से प्राप्त सामान खरीदता था। अब जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि बरामद या ठगी से हासिल किए गए मोबाइल फोल्डर केवल इसी एक घटना में खपाए गए थे या इससे पहले भी इसी तरीके से सामान हासिल किया गया था। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि गिरोह में और कितने लोग जुड़े हुए थे।

पुलिस के अनुसार, मामले का कथित मास्टरमाइंड मनीष कुमार पहले मोबाइल रिपेयरिंग का काम करता था। मोबाइल से जुड़ी तकनीकी जानकारी और डिजिटल माध्यमों की समझ का इस्तेमाल वह ठगी के लिए करता था। पुलिस का आरोप है कि वह डिजिटल टूल्स और फर्जी ऐप की मदद से ऐसी पेमेंट रसीद और स्क्रीनशॉट तैयार करता था, जो देखने में वास्तविक भुगतान जैसा प्रतीत होता था। इसके बाद इन रसीदों को व्हाट्सएप पर व्यापारी को भेजकर भुगतान होने का भरोसा दिलाया जाता था।

इस तरह की ठगी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि कारोबारी केवल भेजे गए स्क्रीनशॉट या पेमेंट रसीद को देखकर भरोसा कर लेता है। आरोपित इसी जल्दबाजी का फायदा उठाते थे। पुलिस की जांच के मुताबिक, पहले व्यापारी से संपर्क कर सामान की जरूरत बताई जाती थी। ऑर्डर तय होने के बाद भुगतान किए जाने का दावा किया जाता और उसका फर्जी स्क्रीनशॉट भेज दिया जाता। अगर व्यापारी तत्काल बैंक खाते में वास्तविक क्रेडिट की पुष्टि नहीं करता तो सामान कूरियर या डिलीवरी सेवा के माध्यम से आरोपितों तक पहुंच जाता था। इस मामले में भी पुलिस ने इसी तरीके के इस्तेमाल का दावा किया है।

मुजफ्फरपुर पुलिस की कार्रवाई में एक अहम बात यह भी सामने आई कि गिरोह ने सामान की सीधी डिलीवरी लेने के बजाय रैपिडो जैसी डिलीवरी सेवा का इस्तेमाल किया। इससे आरोपित खुद दुकान या व्यापारी के सामने आने से बच सकते थे और सामान किसी दूसरे स्थान पर मंगवाया जा सकता था। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि डिलीवरी के लिए किन मोबाइल नंबरों और किन स्थानों का इस्तेमाल किया गया। साथ ही डिलीवरी के दौरान इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन और बाइक से जुड़े डिजिटल तथा तकनीकी साक्ष्यों की भी जांच की जा रही है।

पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि इस गिरोह ने अब तक कितने कारोबारियों को निशाना बनाया है। प्रारंभिक मामला मोबाइल फोल्डर की 210 पीस खेप से जुड़ा है, लेकिन पुलिस यह मानकर चल रही है कि आरोपितों की गतिविधियों की पूरी जानकारी तकनीकी जांच के बाद ही सामने आएगी। उनके मोबाइल फोन में मौजूद बातचीत, नंबर, चैट, डिजिटल भुगतान से संबंधित जानकारी और अन्य डेटा की जांच से पुराने मामलों के बारे में भी सुराग मिल सकते हैं।

जांच एजेंसी यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी रसीद बनाने के लिए कौन से डिजिटल टूल्स और ऐप इस्तेमाल किए जाते थे। अगर जांच में ऐसे किसी संगठित डिजिटल नेटवर्क की जानकारी मिलती है तो पुलिस उसकी अन्य कड़ियों तक पहुंचने की कोशिश कर सकती है। खास बात यह है कि आरोपितों ने कथित तौर पर केवल ऑनलाइन भुगतान का फर्जी प्रमाण तैयार किया और वास्तविक बैंक ट्रांजेक्शन किए बिना सामान हासिल किया। इस तरह के मामलों में बैंक रिकॉर्ड और डिजिटल डिवाइस की जांच महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकती है।

पुलिस के मुताबिक, मनीष कुमार की गिरफ्तारी के बाद उसकी निशानदेही पर दो अन्य आरोपितों तक पहुंच बनाई गई। इससे पुलिस को यह समझने में मदद मिली कि कथित गिरोह में अलग-अलग लोगों की भूमिकाएं अलग थीं। एक व्यक्ति ऑनलाइन संपर्क और फर्जी भुगतान दिखाने का काम करता था, दूसरा डिलीवरी प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल होता था और तीसरे व्यक्ति पर ठगी के सामान को खरीदने या आगे खपाने की भूमिका का आरोप है। हालांकि इन भूमिकाओं से जुड़े पुलिस के दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में होगी।

इस मामले में पुलिस ने जिस तेजी से कार्रवाई की, वह भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शिकायत मिलने के बाद एसएसपी के निर्देश पर विशेष टीम बनाई गई और साइबर डीएसपी के नेतृत्व में तकनीकी तथा मानवीय अनुसंधान शुरू किया गया। पुलिस का कहना है कि साक्ष्य जुटाने और आरोपितों की पहचान की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी, जिसके बाद आठ घंटे के भीतर कथित मास्टरमाइंड को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उसकी निशानदेही पर बाकी दोनों आरोपितों तक पहुंच बनाई गई।

इस तरह के फर्जी पेमेंट फ्रॉड से कारोबारियों को विशेष रूप से सतर्क रहने की जरूरत है। केवल व्हाट्सएप पर भेजे गए पेमेंट स्क्रीनशॉट, बैंक रसीद या किसी ऐप पर दिखाई गई भुगतान की तस्वीर को देखकर सामान भेजना जोखिमपूर्ण हो सकता है। वास्तविक भुगतान की पुष्टि बैंक खाते में रकम क्रेडिट होने के बाद ही की जानी चाहिए। अगर भुगतान का दावा किया गया हो लेकिन बैंक स्टेटमेंट या बैंकिंग ऐप में रकम दिखाई नहीं दे रही हो तो सामान की डिलीवरी रोक देना जरूरी है।

ऑनलाइन कारोबार में फर्जी रसीदों का इस्तेमाल करने वाले लोग असली बैंक रसीद जैसी दिखने वाली तस्वीर या स्क्रीनशॉट तैयार कर सकते हैं। ऐसे में व्यापारी को ग्राहक के भेजे हुए दस्तावेज के बजाय अपने बैंक खाते में वास्तविक लेन-देन की पुष्टि करनी चाहिए। खासकर बड़ी मात्रा में सामान भेजते समय भुगतान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना बेहद जरूरी है। मुजफ्फरपुर का यह मामला इसी तरह की सावधानी की जरूरत को सामने लाता है।

पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि आरोपितों ने कथित तौर पर हासिल किए गए सामान को किस कीमत पर और किन लोगों को बेचा। यदि सामान को बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर बेचा गया है तो उससे जुड़े खरीदारों और दुकानदारों से भी पूछताछ की जा सकती है। पुलिस यह जानने का प्रयास करेगी कि सामान बेचने से प्राप्त रकम का इस्तेमाल किस तरह किया गया और क्या इस पैसे का कोई डिजिटल लेन-देन हुआ था।

जांच में आरोपितों के मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरणों से महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की संभावना है। साइबर अपराध के मामलों में मोबाइल चैट, कॉल रिकॉर्ड, सोशल मीडिया अकाउंट, ऑनलाइन भुगतान से जुड़े विवरण और डिलीवरी लोकेशन जैसी जानकारियां पुलिस को नेटवर्क की दूसरी कड़ियों तक पहुंचाने में मदद कर सकती हैं। यदि पुराने लेन-देन या अन्य व्यापारियों से संपर्क की जानकारी मिलती है तो पुलिस उन मामलों को भी जोड़कर जांच आगे बढ़ा सकती है।

फिलहाल मुजफ्फरपुर पुलिस की कार्रवाई में तीन आरोपितों की गिरफ्तारी हुई है और कथित गिरोह की कार्यप्रणाली को लेकर जांच जारी है। पुलिस के अनुसार, मामले का मुख्य आरोपी मनीष कुमार, डिलीवरी लेने वाले रिमझिम कुमार और ठगी का सामान खरीदने के आरोप में मो. परवेज आलम गिरफ्तार किए गए हैं। पुलिस ने मोबाइल फोन और बाइक समेत अन्य संबंधित साक्ष्य अपने कब्जे में लिए हैं। मामले में आगे और लोगों की भूमिका सामने आती है या नहीं, यह जांच पूरी होने के बाद स्पष्ट होगा।

मुजफ्फरपुर में सामने आया यह मामला यह भी बताता है कि साइबर ठगी अब केवल बैंक खाते से पैसे निकालने तक सीमित नहीं है। ठग डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर बिना वास्तविक भुगतान किए सीधे सामान हासिल करने की कोशिश भी कर रहे हैं। कारोबारियों को ऐसे मामलों से बचने के लिए ग्राहक की पहचान, भुगतान की वास्तविक स्थिति और डिलीवरी से पहले बैंक रिकॉर्ड की पुष्टि पर विशेष ध्यान देना होगा। फर्जी स्क्रीनशॉट या रसीद को भुगतान का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

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