नौकरी चाहिए, सिर्फ आश्वासन नहीं मुजफ्फरपुर में छात्र-युवा संसद में उठा भविष्य का सवाल, शिक्षा, रोजगार और पेपर लीक पर सरकार को घेरा

मुजफ्फरपुर में छात्र-युवा संसद के दौरान शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक और फीस वृद्धि के मुद्दे उठे। युवाओं ने सरकार से ठोस रोजगार की मांग की।
नौकरी चाहिए, सिर्फ आश्वासन नहीं मुजफ्फरपुर में छात्र-युवा संसद में उठा भविष्य का सवाल, शिक्षा, रोजगार और पेपर लीक पर सरकार को घेरा
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मुजफ्फरपुर में छात्र-युवा संसद के दौरान शिक्षा और रोजगार का सवाल प्रमुखता से उठाया गया। छात्र-युवा संगठनों की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में युवाओं ने कहा कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि पढ़ाई पूरी करने के बाद सम्मानजनक और स्थायी रोजगार के अवसर चाहिए। शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों, पेपर लीक, बढ़ती फीस और बेरोजगारी को लेकर सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की गई।

मुजफ्फरपुर समाहरणालय परिसर में आयोजित छात्र-युवा संवाद/संसद में बड़ी संख्या में छात्र-युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का आयोजन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) और इंकलाबी नौजवान सभा (आरवाईए) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। वक्ताओं ने शिक्षा, परीक्षा और रोजगार से जुड़े सवालों को युवाओं के भविष्य से जोड़ते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए।

कार्यक्रम में यह बात जोर देकर कही गई कि आज बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। वे कई वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन परीक्षा प्रक्रिया में देरी, पेपर लीक या परिणाम में अनिश्चितता जैसी समस्याओं के कारण उनका समय और पैसा दोनों प्रभावित होते हैं। ऐसे में युवाओं की मांग है कि भर्ती और परीक्षा व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए तथा सरकारी विभागों में खाली पड़े पदों को समयबद्ध तरीके से भरा जाए।

छात्र नेताओं ने रोजगार को केवल नौकरी पाने का सवाल नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य और आत्मनिर्भरता से जुड़ा विषय बताया। उनका कहना था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद यदि रोजगार उपलब्ध नहीं होता है तो युवाओं के सामने आर्थिक दबाव बढ़ता है। कई परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर वर्षों तक खर्च करते हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिलने पर युवा फिर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट जाते हैं।

मुजफ्फरपुर की छात्र-युवा संसद में शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में पर्याप्त संसाधन, बेहतर शैक्षणिक वातावरण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना जरूरी है। छात्रों का कहना था कि शिक्षा को केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं किया जा सकता। ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो विद्यार्थियों को रोजगार और कौशल से भी जोड़े।

कार्यक्रम में फीस वृद्धि का मुद्दा भी उठाया गया। आयोजकों की ओर से यूजी, पीजी और पीएचडी स्तर पर बढ़ी फीस को वापस लेने की मांग रखी गई। इसके साथ ही 7.5 सीजीपीए की बाध्यता खत्म करने की मांग भी सामने आई।

छात्रों ने परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि प्रतियोगी परीक्षाओं में किसी भी तरह की गड़बड़ी का सबसे बड़ा नुकसान उन अभ्यर्थियों को होता है जिन्होंने वर्षों तक तैयारी की होती है। परीक्षा रद्द होने या दोबारा आयोजित होने पर अभ्यर्थियों को फिर से वही प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है।

पेपर लीक का मुद्दा भी छात्र-युवा संसद में प्रमुख रहा। वक्ताओं ने परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और प्रश्नपत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। उनका कहना था कि यदि किसी परीक्षा में पेपर लीक होता है तो केवल परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि हजारों-लाखों विद्यार्थियों का भरोसा पूरी व्यवस्था से कमजोर होता है।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए को भंग करने की मांग भी रखी गई। इसके साथ नई शिक्षा नीति 2020 को वापस लेने की मांग की गई। ये मांगें छात्र संगठनों की ओर से पहले भी उठाई जाती रही हैं।

आरवाईए की ओर से रोजगार के सवाल पर सरकार की नीतियों की आलोचना की गई। वक्ताओं ने ठेका, संविदा और आउटसोर्सिंग जैसी व्यवस्थाओं को युवाओं के भविष्य से जोड़ते हुए सवाल उठाए। उनका कहना था कि युवाओं को स्थायी और सम्मानजनक रोजगार के अवसर मिलने चाहिए, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकें।

छात्र-युवा संसद में महिलाओं के रोजगार का मुद्दा भी चर्चा में आया। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में अवसर बढ़ाने के साथ महिलाओं के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना भी जरूरी है। रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से परिवार और समाज दोनों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है।

कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि युवाओं की समस्याओं को केवल चुनावी वादों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। नौकरी और रोजगार से जुड़े सवालों पर स्पष्ट नीति, रिक्त पदों का आंकड़ा, भर्ती कैलेंडर और समयबद्ध नियुक्ति प्रक्रिया की जरूरत है। युवाओं को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि किस विभाग में कितने पद खाली हैं और उनकी भर्ती कब तक पूरी होगी।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि परीक्षा की तारीख बार-बार बदलती है या परिणाम में लंबे समय तक देरी होती है तो अभ्यर्थियों की आगे की योजना प्रभावित होती है। छात्र नेताओं ने परीक्षा कैलेंडर को व्यवस्थित करने और तय समय सीमा में परीक्षा व परिणाम घोषित करने की मांग की।

उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत पर भी चर्चा हुई। विद्यार्थियों को केवल पारंपरिक पाठ्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय तकनीकी, डिजिटल, शोध और व्यावहारिक कौशल से जोड़ने की आवश्यकता बताई गई। इससे पढ़ाई पूरी करने के बाद निजी क्षेत्र और स्वरोजगार में भी अवसर तलाशने में युवाओं को मदद मिल सकती है।

मुजफ्फरपुर में आयोजित इस कार्यक्रम को व्यापक छात्र-युवा अभियान का हिस्सा बताया गया। बिहार के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में भी आइसा और आरवाईए की ओर से छात्र-युवा संसद आयोजित की जा रही हैं। दरभंगा में आयोजित कार्यक्रम में भी शिक्षा, परीक्षा और रोजगार के सवालों पर चर्चा हुई थी।

इसी तरह आरा में आयोजित छात्र-युवा संसद में भी शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक और फीस वृद्धि जैसे मुद्दों को उठाया गया था। वहां वक्ताओं ने कहा था कि शिक्षा और रोजगार युवाओं के सामने सबसे बड़े सवालों में शामिल हैं और इन मुद्दों को लेकर अभियान को पूरे बिहार में आगे बढ़ाया जाएगा।

इस अभियान के जरिए छात्र संगठन युवाओं को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि अलग-अलग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के विद्यार्थियों की समस्याएं कई मामलों में समान हैं। परीक्षा में देरी, परिणाम का इंतजार, फीस वृद्धि, बेरोजगारी और सरकारी भर्तियों की कमी जैसी समस्याएं बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को प्रभावित करती हैं।

मुजफ्फरपुर में आयोजित कार्यक्रम में यह सवाल भी सामने आया कि आखिर पढ़ाई पूरी करने के बाद युवा क्या करें। छात्रों का कहना है कि डिग्री हासिल करने के बाद नौकरी के लिए वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना और फिर परीक्षा प्रक्रिया में अनिश्चितता का सामना करना युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

युवाओं ने सरकार से रोजगार को प्राथमिकता देने की मांग की। उनका कहना है कि केवल नए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करना पर्याप्त नहीं है। प्रशिक्षण के बाद रोजगार या स्वरोजगार के वास्तविक अवसर उपलब्ध कराना भी जरूरी है। इसी तरह सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए भर्ती प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने की जरूरत है।

छात्रों ने शिक्षा के निजीकरण को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि शिक्षा महंगी होने से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों के सामने आगे की पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो सकता है। फीस वृद्धि पर रोक और सरकारी शिक्षण संस्थानों को मजबूत करने की मांग इसी चिंता से जुड़ी है।

कार्यक्रम में नई शिक्षा नीति को लेकर भी विरोध दर्ज कराया गया। आयोजकों ने एनईपी 2020 को वापस लेने की मांग की। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, परीक्षा व्यवस्था और उच्च शिक्षा में छात्रों के अधिकारों से जुड़े सवाल भी उठाए गए।

छात्र-युवा संसद में वक्ताओं ने कहा कि युवाओं की आवाज को केवल सड़क या सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहना चाहिए। लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाने के लिए ऐसे मंच जरूरी हैं। कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं को अपने मुद्दे साझा करने और सामूहिक रूप से आगे की रणनीति तय करने का अवसर मिला।

आयोजकों ने शिक्षा और रोजगार के सवालों को लेकर आगे भी आंदोलन जारी रखने की बात कही। इसके तहत विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्र-युवा संवाद आयोजित करने तथा युवाओं को इन मुद्दों पर संगठित करने की योजना बताई गई है। मुजफ्फरपुर कार्यक्रम के बाद भी रोजगार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर अभियान जारी रखने की बात सामने आई।

युवाओं की मांगों में एक महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि सरकार को रोजगार के क्षेत्र में स्पष्ट आंकड़े सामने रखने चाहिए। कितने सरकारी पद खाली हैं, किन विभागों में भर्ती होनी है, परीक्षा कब होगी और नियुक्ति कब तक पूरी होगी—इन सवालों पर स्पष्टता युवाओं को भविष्य की तैयारी करने में मदद कर सकती है।

बेरोजगारी का असर केवल युवा तक सीमित नहीं रहता। जब कोई शिक्षित युवा लंबे समय तक नौकरी की तलाश में रहता है तो परिवार पर आर्थिक दबाव भी बढ़ता है। दूसरी ओर, रोजगार मिलने पर युवा अपनी आय से परिवार की मदद करने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी योगदान दे सकता है।

बिहार जैसे राज्य में रोजगार का सवाल पलायन से भी जुड़ा हुआ है। बड़ी संख्या में युवा बेहतर रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों और बड़े शहरों की ओर जाते हैं। यदि राज्य में पर्याप्त औद्योगिक, सेवा क्षेत्र और सरकारी रोजगार के अवसर विकसित होते हैं तो स्थानीय स्तर पर युवाओं को विकल्प मिल सकते हैं।

मुजफ्फरपुर उत्तर बिहार का एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक और आर्थिक केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी आसपास के जिलों से पढ़ने आते हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर रोजगार और कौशल विकास के अवसर बढ़ाना छात्र-युवाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

छात्र-युवा संसद में उठे सवालों का केंद्र यही रहा कि युवाओं के भविष्य को लेकर ठोस नीति और समयबद्ध कार्रवाई की जरूरत है। छात्रों का कहना है कि आश्वासन सुनने के बजाय उन्हें रोजगार की स्पष्ट राह चाहिए। परीक्षा की तारीख से लेकर नियुक्ति तक पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए।

कार्यक्रम में यह भी संदेश दिया गया कि शिक्षा और रोजगार के सवाल अलग-अलग नहीं हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तभी सार्थक होगी जब विद्यार्थी अपनी योग्यता के आधार पर आगे रोजगार या स्वरोजगार के अवसर हासिल कर सकें। इसी तरह रोजगार के लिए जरूरी कौशल देने वाली शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।

कुल मिलाकर मुजफ्फरपुर में आयोजित छात्र-युवा संसद में युवाओं ने शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक, परीक्षा में पारदर्शिता, फीस वृद्धि और नई शिक्षा नीति जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। सबसे बड़ा सवाल रोजगार का रहा—युवाओं ने कहा कि उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं बल्कि नौकरी और आत्मनिर्भरता के वास्तविक अवसर चाहिए। आयोजकों ने इन मुद्दों को लेकर आंदोलन और संवाद को आगे बढ़ाने की बात कही है।

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