उत्तराखंड में आज निकलेगी नंदा देवी की 'बड़ी जात' 12 साल बाद कैलाश जाएंगी मां, कुरुड़ से चलेंगी 3 डोलियां, एक नहीं पहुंचेगी होमकुंड

उत्तराखंड में नंदा देवी की बड़ी जात 5 सितंबर से कुरुड़ से शुरू होगी। 12 साल बाद मां नंदा कैलाश जाएंगी। तीन डोलियां निकलेंगी और 20 सितंबर को होमकुंड पहुंचेंगी।
उत्तराखंड में आज निकलेगी नंदा देवी की 'बड़ी जात' 12 साल बाद कैलाश जाएंगी मां, कुरुड़ से चलेंगी 3 डोलियां, एक नहीं पहुंचेगी होमकुंड
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उत्तराखंड के चमोली जिले में मां नंदा देवी की ऐतिहासिक बड़ी लोकजात यात्रा शनिवार से शुरू होने जा रही है। 12 साल के लंबे अंतराल के बाद मां नंदा अपनी मायके की धरती से कैलाश के लिए विदा होंगी। इस धार्मिक यात्रा को लेकर चमोली और आसपास के क्षेत्रों में विशेष उत्साह का माहौल है। नंदानगर क्षेत्र के कुरुड़ स्थित मां नंदा देवी राजराजेश्वरी सिद्धपीठ से यात्रा की शुरुआत होगी और विभिन्न पड़ावों से होते हुए यह यात्रा होमकुंड पहुंचेगी, जहां मां नंदा को कैलाश के लिए विदाई दी जाएगी।

मां नंदा की बड़ी जात यात्रा उत्तराखंड की प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक यात्राओं में शामिल है। इसे स्थानीय लोग मां नंदा की मायके से ससुराल यानी कैलाश की ओर विदाई के रूप में देखते हैं। यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां नंदा के साथ पैदल चलते हैं। कठिन पहाड़ी रास्तों, ऊंचे हिमालयी पड़ावों और प्राकृतिक चुनौतियों के बीच श्रद्धालुओं का यह सफर आस्था और परंपरा का अनूठा उदाहरण माना जाता है।

इस बार यात्रा को लेकर सबसे खास बात यह है कि कुरुड़ से मां नंदा की तीन डोलियां यात्रा पर निकलेंगी। इनमें से एक डोली होमकुंड तक नहीं जाएगी और निर्धारित स्थान पर ही रुककर वापस लौटेगी। अन्य डोलियां यात्रा के प्रमुख पड़ावों से होती हुई आगे बढ़ेंगी। अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी इन डोलियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी यात्रा में शामिल होंगे।

कुरुड़ से यात्रा शुरू होने के साथ ही मां नंदा के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठेगा। श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां नंदा की पूजा-अर्चना करेंगे और डोलियों के साथ यात्रा पर निकलेंगे। स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि अपनी सदियों पुरानी लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर भी है।

बड़ी जात यात्रा के दौरान कई गांवों और पड़ावों पर मां नंदा की डोली का स्वागत किया जाता है। स्थानीय लोग श्रद्धालुओं के लिए भोजन और रहने की व्यवस्था करने में सहयोग करते हैं। यात्रा के रास्ते में जगह-जगह धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इससे यात्रा का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।

इस यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होमकुंड मानी जाती है। हिमालय की ऊंचाई पर स्थित होमकुंड को मां नंदा की कैलाश विदाई से जोड़ा जाता है। यात्रा के अंतिम चरण में श्रद्धालु कठिन पहाड़ी मार्ग पार कर यहां पहुंचते हैं। 20 सितंबर को होमकुंड में मां नंदा की कैलाश विदाई के साथ इस वर्ष की बड़ी लोकजात यात्रा का समापन होने की जानकारी सामने आई है।

यात्रा को लेकर प्रशासन और स्थानीय स्तर पर भी तैयारियां की गई हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए मार्गों, पड़ावों और जरूरी सुविधाओं को लेकर व्यवस्था की जा रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदलने के कारण यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को मौसम की स्थिति पर नजर रखने और प्रशासन की ओर से जारी निर्देशों का पालन करने की जरूरत होगी।

नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा का धार्मिक महत्व जितना बड़ा है, उतना ही महत्वपूर्ण इसका सांस्कृतिक पक्ष भी है। उत्तराखंड के पर्वतीय समाज में मां नंदा को बेटी के रूप में पूजा जाता है। यही वजह है कि मां नंदा की यात्रा को बेटी की विदाई की भावनाओं से भी जोड़ा जाता है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं में भक्ति के साथ भावुकता का माहौल भी देखने को मिलता है।

12 साल बाद होने वाली इस यात्रा का इंतजार स्थानीय लोगों को लंबे समय से था। हर बार की तरह इस बार भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के यात्रा में शामिल होने की उम्मीद है। कई लोग अलग-अलग पड़ावों से यात्रा में शामिल होंगे, जबकि कुछ श्रद्धालु पूरी यात्रा में डोलियों के साथ पैदल चलेंगे। कठिन चढ़ाई और दुर्गम रास्तों के बावजूद मां नंदा के प्रति आस्था लोगों को इस यात्रा से जोड़ती है।

यात्रा के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोकगीतों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। मां नंदा की डोली के साथ चलने वाले श्रद्धालु धार्मिक गीत और जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। इससे पहाड़ के गांवों और यात्रा मार्ग पर अलग ही आध्यात्मिक वातावरण बन जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार कई स्थानों पर ग्रामीण मां नंदा की डोली का स्वागत कर पूजा-अर्चना करते हैं।

कुरुड़ स्थित सिद्धपीठ इस यात्रा का प्रमुख केंद्र है। यहीं से बड़ी जात यात्रा का औपचारिक प्रस्थान होता है। यात्रा शुरू होने से पहले मंदिर में विशेष पूजा और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद डोलियों को यात्रा के लिए रवाना किया जाता है। मां नंदा की डोली के साथ चलने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह क्षण बेहद महत्वपूर्ण होता है।

इस बार यात्रा के दौरान तीन डोलियों का निकलना भी विशेष आकर्षण का विषय है। एक डोली का होमकुंड तक नहीं जाना यात्रा की परंपरा और उससे जुड़े स्थानीय धार्मिक विधान का हिस्सा है। श्रद्धालु इस परंपरा को पूरी आस्था के साथ निभाते हैं। यात्रा के अलग-अलग पड़ावों पर डोलियों की मौजूदगी से स्थानीय लोगों की भागीदारी भी बढ़ती है।

बड़ी लोकजात यात्रा के मार्ग में प्राकृतिक सुंदरता के साथ कई कठिन चुनौतियां भी हैं। ऊंचाई बढ़ने के साथ मौसम ठंडा होता जाता है और रास्ते अधिक दुर्गम हो जाते हैं। बारिश या खराब मौसम की स्थिति में फिसलन और भूस्खलन का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए यात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं के लिए पर्याप्त गर्म कपड़े, जरूरी दवाएं और अन्य आवश्यक सामान रखना महत्वपूर्ण होगा।

प्रशासन की ओर से भी यात्रा के दौरान सुरक्षा और सुविधाओं पर नजर रखी जा रही है। श्रद्धालुओं की आवाजाही, चिकित्सा सहायता, पेयजल और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को लेकर संबंधित विभागों को सक्रिय रहने की जरूरत है। पहाड़ी यात्रा होने के कारण किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी।

मां नंदा की बड़ी जात यात्रा केवल चमोली जिले तक सीमित नहीं रहती। उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में मां नंदा के प्रति गहरी आस्था है और यात्रा के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों से श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं। यही कारण है कि 12 साल में होने वाली इस यात्रा को लेकर प्रदेश के कई हिस्सों में विशेष उत्सुकता रहती है।

कैलाश की ओर मां नंदा की विदाई इस यात्रा का भावनात्मक चरम माना जाता है। मायके से बेटी की विदाई की तरह श्रद्धालु मां नंदा को अंतिम पड़ाव तक पहुंचाते हैं। होमकुंड में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के बाद मां नंदा को कैलाश के लिए विदा किया जाता है। इसी के साथ श्रद्धालु अपनी यात्रा को पूर्ण मानते हैं।

इस वर्ष 5 सितंबर से शुरू होने वाली बड़ी लोकजात यात्रा 20 सितंबर को होमकुंड में कैलाश विदाई के साथ पूरी होगी। यात्रा के दौरान कई दिनों तक चमोली के पहाड़ी इलाकों में धार्मिक गतिविधियों का माहौल बना रहेगा। स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले श्रद्धालु भी इस ऐतिहासिक यात्रा के साक्षी बनेंगे।

12 साल बाद होने वाली मां नंदा की यह बड़ी जात उत्तराखंड की धार्मिक परंपरा के साथ-साथ पहाड़ की लोक संस्कृति की भी जीवंत तस्वीर पेश करेगी। कुरुड़ से निकलने वाली तीन डोलियां, श्रद्धालुओं की पैदल यात्रा, पारंपरिक पूजा-अनुष्ठान और अंत में होमकुंड में कैलाश विदाई इस पूरी यात्रा को विशेष बनाते हैं। शनिवार से शुरू होने वाली इस यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह चरम पर है।

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