नई वैश्विक स्टडी के मुताबिक प्लास्टिक का पूरा लाइफसाइकिल इंसानी सेहत के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। शोध में दावा किया गया है कि अगर मौजूदा उत्पादन और खपत का ट्रेंड जारी रहा, तो 2040 तक प्लास्टिक से जुड़ी बीमारियों का बोझ दोगुने से ज्यादा हो सकता है।
प्लास्टिक प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम: लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और फ्रांस के संस्थानों की रिसर्च में सामने आया है कि प्लास्टिक सिस्टम से निकलने वाले ग्रीनहाउस गैस, जहरीले केमिकल और वायु प्रदूषक इंसानी सेहत पर गंभीर असर डाल रहे हैं। यह अध्ययन बताता है कि कच्चे माल के निष्कर्षण से लेकर प्लास्टिक के उत्पादन, इस्तेमाल और खुले में जलाने तक हर चरण में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ता है, जिससे कैंसर, श्वसन रोग और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
प्लास्टिक का पूरा सिस्टम बन रहा सेहत के लिए खतरा
स्टडी में बताया गया है कि प्लास्टिक सिस्टम से निकलने वाले ग्रीनहाउस गैस, हवा को प्रदूषित करने वाले कण और जहरीले केमिकल्स ग्लोबल वार्मिंग, कैंसर और कई गंभीर बीमारियों का कारण बन रहे हैं। सबसे ज्यादा नुकसान प्लास्टिक के शुरुआती उत्पादन और खुले में जलाने से हो रहा है, जहां बड़ी मात्रा में जहरीला धुआं और केमिकल वातावरण में फैलते हैं।
रिसर्च के अनुसार, प्लास्टिक के कच्चे माल के निष्कर्षण से लेकर पॉलीमर निर्माण, फिर इस्तेमाल के बाद रीसाइक्लिंग, डंपिंग और खुले में जलाने तक, हर स्टेज पर मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। इन सभी प्रक्रियाओं से हवा और पानी दोनों प्रदूषित होते हैं, जिससे श्वसन रोग, हृदय संबंधी समस्याएं और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

2040 तक दोगुना हो सकता है बीमारी का बोझ
लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और फ्रांस के कई संस्थानों के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में अनुमान लगाया है कि प्लास्टिक से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम 2040 तक दोगुने से ज्यादा हो सकते हैं। इसमें डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स (DALYs) के आधार पर आकलन किया गया, जो बताता है कि बीमारियों की वजह से इंसान कितने स्वस्थ साल खो देता है।
रिसर्चर्स का कहना है कि मौजूदा बिजनेस-एज-यूजुअल मॉडल यानी बिना बदलाव के उत्पादन और खपत जारी रहने की स्थिति में हालात और खराब होंगे। अगर 2100 तक भी प्लास्टिक उत्पादन को नियंत्रित नहीं किया गया, तो पर्यावरण के साथ-साथ हेल्थ सिस्टम पर भी असहनीय दबाव पड़ेगा।
समाधान की दिशा में ग्लोबल नीति की जरूरत
अध्ययन में यह भी साफ कहा गया है कि प्लास्टिक की केमिकल संरचना को लेकर पारदर्शिता की कमी प्रभावी नीति बनाने में बड़ी बाधा है। बिना पूरी जानकारी के लाइफसाइकिल असेसमेंट करना मुश्किल हो जाता है, जिससे सही समाधान तय करना भी कठिन हो जाता है।
रिसर्चर्स ने सुझाव दिया है कि प्राइमरी यानी वर्जिन प्लास्टिक के उत्पादन में बड़ी कटौती जरूरी है। इसके साथ ही ऐसी वैश्विक नीति की जरूरत है, जो प्लास्टिक के पूरे लाइफसाइकिल को ध्यान में रखते हुए गैर-जरूरी इस्तेमाल को कम करे और सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा दे। इसी दिशा में 175 से अधिक देशों ने ग्लोबल प्लास्टिक ट्रीटी पर सहमति जताई है, जिसका मकसद दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करना है।











