उस्तरा-कैंची नहीं, हाथों से उखाड़े सिर के बाल राजगीर में जैन संत सोहम मुनि की कठिन साधना, जानिए क्यों करते हैं केश लोच

राजगीर के नौलखा जैन मंदिर में सोहम मुनि ने हाथों से केश लोच किया। जानिए जैन धर्म में बाल उखाड़ने की इस कठिन साधना का क्या महत्व है।
उस्तरा-कैंची नहीं, हाथों से उखाड़े सिर के बाल राजगीर में जैन संत सोहम मुनि की कठिन साधना, जानिए क्यों करते हैं केश लोच
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बिहार के प्रसिद्ध तीर्थस्थल राजगीर में जैन धर्म की कठिन साधना का एक विशेष दृश्य देखने को मिला। राजगीर स्थित श्री जैन श्वेतांबर कोठी नौलखा मंदिर परिसर में जैन संत सोहम मुनि जी महाराज साहब ने केश लोच की साधना की। इस दौरान उन्होंने सिर, दाढ़ी और मूंछ के बालों को उस्तरा या कैंची से काटने के बजाय हाथों से खींचकर उखाड़ा। इस धार्मिक साधना को देखने के लिए बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु और अन्य लोग मंदिर परिसर में मौजूद रहे।

पहली नजर में यह प्रक्रिया बेहद कठिन और पीड़ादायक दिखाई देती है, क्योंकि इसमें बालों को काटा नहीं जाता, बल्कि उन्हें हाथों से खींचकर हटाया जाता है। हालांकि जैन साधना परंपरा में केश लोच का अर्थ केवल बाल हटाना नहीं है, बल्कि इसे त्याग, संयम, सहनशीलता और शरीर के प्रति मोह को कम करने वाली तपस्या के रूप में देखा जाता है। सोहम मुनि ने भी इस साधना के उद्देश्य को शरीर और सुंदरता के प्रति मोह का त्याग तथा आत्मसंयम से जोड़ा।

जैन परंपरा में साधु जीवन सांसारिक सुख-सुविधाओं और भौतिक आकर्षण से दूरी बनाने पर आधारित माना जाता है। इसी क्रम में केश लोच को महत्वपूर्ण साधना माना गया है। इसका सीधा अर्थ है केशों का लोचन यानी बालों को हाथों से उखाड़ना। जैन साधु और साध्वियां इस प्रक्रिया में सिर के साथ दाढ़ी और मूंछ के बाल भी हाथ से हटाते हैं। सामान्य व्यक्ति के लिए यह प्रक्रिया असहज या बेहद कठिन लग सकती है, लेकिन साधु जीवन में इसे धैर्य और सहनशीलता के अभ्यास के तौर पर देखा जाता है।

सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर जैन संत बालों को कैंची, ब्लेड या उस्तरे से काटने के बजाय हाथों से क्यों उखाड़ते हैं। जैन मान्यताओं के अनुसार इसका संबंध अहिंसा और वैराग्य से है। माना जाता है कि किसी औजार का इस्तेमाल करने के बजाय हाथों से केश निकालने की परंपरा सूक्ष्म जीवों को होने वाली संभावित हिंसा से बचने की भावना से जुड़ी है। इसके साथ ही बालों और शरीर की सुंदरता के प्रति लगाव को कम करना भी इस साधना का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य माना जाता है।

केश लोच के दौरान होने वाली पीड़ा को भी जैन साधना का हिस्सा माना जाता है। बालों को जड़ से निकालने में स्वाभाविक रूप से असुविधा होती है, लेकिन साधु शांत भाव से इस प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास करते हैं। जैन परंपरा में इसे शारीरिक पीड़ा पर मानसिक नियंत्रण, धैर्य और सहनशीलता की साधना के रूप में देखा जाता है। इसका उद्देश्य शरीर को कष्ट देना मात्र नहीं, बल्कि साधक को देह और भौतिक आकर्षण से ऊपर उठाने का प्रयास माना जाता है।

सोहम मुनि के केश लोच के दौरान भी धार्मिक वातावरण बना रहा। मंदिर परिसर में जैन समाज के श्रद्धालु मौजूद रहे और उन्होंने इस कठिन साधना को देखा। रिपोर्ट के अनुसार संत ने बताया कि केश लोच जैन संतों और आर्यिकाओं की कठिन तपस्या है। इसे जैन संतों के 28 मूल गुणों में महत्वपूर्ण माना जाता है और परंपरा के अनुसार साधु-साध्वियां समय-समय पर इस साधना को करते हैं। राजगीर में हुए इस आयोजन में झारखंड के पेटरवार से पहुंचे भुनेश्वर महतो समेत श्वेतांबर कोठी के सहायक प्रबंधक ज्ञानेंद्र पांडेय, कैशियर संजीव कुमार जैन और समाजसेवी अनिता कुमारी गुप्ता सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

केश लोच को केवल बाहरी रूप से देखने पर यह बाल उखाड़ने की प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन जैन दर्शन में इसका आध्यात्मिक अर्थ काफी व्यापक है। बालों को शरीर की सुंदरता और सजावट से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए उन्हें स्वयं हटाना सांसारिक आकर्षण से दूरी बनाने का प्रतीक माना जाता है। साधु जीवन में शरीर की सजावट या आराम की तुलना में आत्मसंयम, साधना और आध्यात्मिक अनुशासन को प्राथमिकता दी जाती है।

जैन संतों की साधना में अहिंसा का विशेष महत्व है। इसी कारण केश लोच के पीछे भी अहिंसा से जुड़ी धार्मिक मान्यता बताई जाती है। जैन परंपरा में जीव मात्र के प्रति संवेदनशीलता पर जोर दिया जाता है और सूक्ष्म जीवों को भी नुकसान न पहुंचाने की भावना रखी जाती है। केश लोच में किसी धारदार उपकरण का इस्तेमाल नहीं करने की परंपरा को इसी सोच से जोड़ा जाता है। हालांकि इसके साथ शरीर और सुंदरता के प्रति मोह का त्याग भी उतना ही महत्वपूर्ण उद्देश्य माना जाता है।

इस साधना का एक दूसरा पहलू आत्मनियंत्रण है। जैन मुनि सांसारिक जीवन से अलग होकर संयमित जीवन जीते हैं। उनके लिए भोजन, वस्त्र, आराम, संपत्ति और शरीर से जुड़ी इच्छाओं पर नियंत्रण साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। केश लोच इसी व्यापक अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। जब कोई साधु बिना किसी औजार के अपने बाल स्वयं या परंपरा के अनुसार सहायता से हटाता है, तो यह उसके लिए धैर्य और मानसिक दृढ़ता की परीक्षा भी मानी जाती है।

राजगीर का जैन धर्म से पुराना और महत्वपूर्ण संबंध रहा है। बिहार सरकार के पर्यटन विभाग के अनुसार राजगीर जैन परंपरा के महत्वपूर्ण स्थलों में शामिल है और यहां समवसरण जैसे पवित्र स्थल भी हैं, जिन्हें भगवान महावीर के उपदेशों से जोड़ा जाता है। राजगीर में मौजूद जैन मंदिर और तीर्थ देशभर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। ऐसे धार्मिक वातावरण में किसी जैन संत द्वारा की जाने वाली कठिन साधना श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखती है।

राजगीर के नौलखा मंदिर की भी जैन समाज में विशेष पहचान है। यह श्री जैन श्वेतांबर परंपरा से जुड़ा तीर्थस्थल है और यहां भगवान मुनिसुव्रत स्वामी का मंदिर स्थित है। मंदिर परिसर अपनी धार्मिक और स्थापत्य विशेषताओं के कारण भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है।

जैन परंपरा में केश लोच को लेकर अलग-अलग विवरणों में इसकी आवृत्ति के संबंध में अंतर मिलता है। राजगीर की ताजा रिपोर्ट में सोहम मुनि ने सामान्यतः वर्ष में दो से चार बार इस साधना का उल्लेख किया है, जबकि अन्य व्याख्यात्मक स्रोत कुछ परंपराओं में इसे वर्ष में एक या दो बार किए जाने की बात बताते हैं। इसलिए इसकी आवृत्ति साधु-साध्वी की परंपरा और धार्मिक अनुशासन के अनुसार अलग हो सकती है।

केश लोच के दौरान साधु पीड़ा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय साधना और आत्मसंयम की भावना में रहने का प्रयास करते हैं। जैन परंपरा में इसे कर्मों की निर्जरा और आत्मिक उन्नति से भी जोड़ा जाता है। यानी साधना का उद्देश्य केवल बाहरी रूप बदलना नहीं, बल्कि मन को इच्छाओं, मोह और भौतिक आकर्षण से दूर करने का प्रयास है।

राजगीर में सोहम मुनि का यह केश लोच इसी कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष चर्चा का विषय बना। हाथों से सिर के बाल उखाड़ने की प्रक्रिया देखकर आम लोगों के मन में कई सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन जैन धर्म के अनुयायियों के लिए यह त्याग और संयम की गहरी धार्मिक परंपरा है। इस साधना में शरीर की सुंदरता या आराम से अधिक महत्व आत्मिक अनुशासन, अहिंसा, सहनशीलता और वैराग्य को दिया जाता है।

राजगीर के नौलखा मंदिर में हुई इस साधना के दौरान मौजूद श्रद्धालुओं के लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जैन मुनि के कठिन संयम और तप को करीब से देखने का अवसर भी रहा। जैन समाज में ऐसी साधनाओं को आध्यात्मिक अनुशासन की अभिव्यक्ति के तौर पर देखा जाता है और यही वजह है कि केश लोच आज भी जैन संतों की तपस्या से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपराओं में शामिल है।

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