रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों की निगरानी के लिए नई GSM कैमरा और सैटेलाइट तकनीक शुरू की जा रही है। इससे रियल-टाइम मॉनिटरिंग होगी और बाघों की मूवमेंट पर लगातार नजर रखी जा सकेगी, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने में मदद मिलेगी।
सवाई माधोपुर: राजस्थान के प्रसिद्ध रणथंभौर टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण और निगरानी व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। अब यहां पहली बार ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्युनिकेशंस (GSM) तकनीक से लैस कैमरों और सैटेलाइट आधारित सिस्टम के जरिए बाघों की रियल-टाइम निगरानी की जाएगी। इस पहल को भारत में वन्यजीव संरक्षण तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अपग्रेड माना जा रहा है।
इस नई व्यवस्था के तहत रणथंभौर के पेरिफेरी क्षेत्रों में घूम रहे बाघों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाएगी, जिससे उनके मूवमेंट, सुरक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकेगा।
GSM कैमरा तकनीक क्या है और कैसे करेगा काम
नई निगरानी प्रणाली में लगाए जा रहे GSM कैमरे खास तकनीक पर आधारित हैं, जिनमें सिम कार्ड का उपयोग किया जाता है। यह कैमरे मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से सीधे डेटा ट्रांसमिट करते हैं, जिससे किसी भी बाघ या वन्यजीव की गतिविधि को लाइव देखा जा सकता है।
इन कैमरों को मोबाइल ऐप से जोड़ा जाएगा, जिससे वन विभाग के अधिकारी और फील्ड स्टाफ रियल-टाइम में मॉनिटरिंग कर सकेंगे। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब बार-बार जंगल में जाकर कैमरा ट्रैप चेक करने की जरूरत कम हो जाएगी और किसी भी गतिविधि की तुरंत जानकारी मिल सकेगी।
रणथंभौर में निगरानी सिस्टम को अपग्रेड करने की बड़ी वजह
इस तकनीकी अपग्रेड की सबसे बड़ी वजह हाल ही में सामने आए बाघों के गायब होने के मामले हैं। रणथंभौर टाइगर रिजर्व में आरबीटी-2504 (माही) और आरबीटी-2510 नामक दो बाघिनें कई दिनों से नजर नहीं आई हैं, जिससे वन विभाग की चिंता बढ़ गई है।
इन दोनों बाघिनों की तलाश के लिए पांच अलग-अलग टीमें लगातार जंगल में पैदल गश्त कर रही हैं, और लगभग 100 कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। इसके बावजूद उनकी लोकेशन स्पष्ट नहीं हो पाई है, जिसके बाद आधुनिक तकनीक की जरूरत महसूस की गई।
![]()
वन विभाग का मानना है कि यदि रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम पहले से मौजूद होता, तो ऐसी स्थिति को बेहतर तरीके से ट्रैक किया जा सकता था।
8 से 10 बाघों की पेरिफेरी में खास निगरानी
नई व्यवस्था के पहले चरण में लगभग 8 से 10 बाघों की निगरानी की जाएगी, जो वर्तमान में रणथंभौर टाइगर रिजर्व के पेरिफेरी इलाकों में घूम रहे हैं। ये वे क्षेत्र हैं जहां बाघ अक्सर जंगल से बाहर निकलकर मानव बस्तियों के करीब पहुंच जाते हैं।
इस तकनीक की मदद से वन विभाग को बाघों की मूवमेंट पैटर्न समझने में मदद मिलेगी और यह भी पता लगाया जा सकेगा कि वे किस रास्ते से जंगल से बाहर निकलते हैं।
थर्मल कैमरों और कैमरा ट्रैप सिस्टम का भी होगा अपग्रेड
GSM कैमरों के साथ-साथ रणथंभौर में पहले से मौजूद थर्मल कैमरों को भी फिर से सक्रिय किया जा रहा है। अब तक 9 थर्मल कैमरे री-एक्टिवेट किए जा चुके हैं, जो रात के समय भी बाघों और अन्य वन्यजीवों की गतिविधियों को रिकॉर्ड करने में सक्षम हैं।
इसके अलावा कैमरा ट्रैप सिस्टम को भी अपग्रेड किया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में नेटवर्क कनेक्टिविटी उपलब्ध है, वहां GSM कैमरों का उपयोग किया जाएगा ताकि डेटा तुरंत उपलब्ध हो सके।
टाइगर कॉरिडोर की पहचान में मिलेगी मदद
नई तकनीक का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सुरक्षित टाइगर कॉरिडोर की पहचान करना भी है। रणथंभौर के बाघ कई बार करौली, धौलपुर, रामगढ़ विषधारी और मध्य प्रदेश तक पहुंच जाते हैं।
GSM और सैटेलाइट तकनीक की मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि बाघ किन रास्तों से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जा रहे हैं। इस डेटा के आधार पर वन विभाग सुरक्षित वन्यजीव मार्गों को चिन्हित करेगा और उन्हें संरक्षित कॉरिडोर के रूप में विकसित करने की योजना बनाएगा।
इससे न केवल बाघों की सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को भी कम किया जा सकेगा।
वन विभाग की तैयारी और एनटीसीए की मंजूरी प्रक्रिया
रणथंभौर टाइगर रिजर्व के डीएफओ के अनुसार इस तकनीक के उपयोग के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) से अनुमति मांगी गई है। अनुमति मिलते ही इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पेरिफेरी क्षेत्रों में लागू किया जाएगा।
पहले चरण में चुनिंदा क्षेत्रों में सिस्टम को टेस्ट किया जाएगा और इसके बाद इसे पूरे रिजर्व में विस्तार दिया जाएगा।
बढ़ती टाइगर आबादी और निगरानी की चुनौती
रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे उनकी निगरानी और प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया है। कई बाघ अब रिजर्व के बाहर के इलाकों में भी घूमते पाए जाते हैं, जिससे उनकी सुरक्षा और स्थानीय लोगों की सुरक्षा दोनों पर असर पड़ता है।
वन विभाग का मानना है कि आधुनिक तकनीक के बिना इतनी बड़ी आबादी की निगरानी प्रभावी ढंग से करना मुश्किल है।









