सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला विधेयक क्या है? जानिए इससे न्याय व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा

सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026 के तहत शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य लंबित मामलों का बोझ कम

संसद ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। यह विधेयक 3 अगस्त 2026 को लोकसभा से पारित हुआ था, जबकि 6 अगस्त 2026 को राज्यसभा ने भी इसे ध्वनिमत से मंजूरी दे दी।

नई दिल्ली: भारत की संसद ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। लोकसभा और राज्यसभा से पारित होने के बाद अब यह विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर कानून का रूप ले लेगा। इस संशोधन के तहत भारत के सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश (CJI) को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाएगी। यानी अब सुप्रीम कोर्ट में कुल 38 न्यायाधीश कार्य कर सकेंगे।

सरकार का कहना है कि इस कदम से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और न्यायिक क्षमता बढ़ेगी। वहीं विपक्ष और कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने विधेयक को मनी बिल के रूप में पेश किए जाने, अध्यादेश के उपयोग और न्यायिक सुधारों की व्यापक दिशा को लेकर सवाल उठाए हैं। यही कारण है कि यह विधेयक संसद के भीतर और बाहर चर्चा का विषय बना हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारत की न्यायपालिका लंबे समय से बढ़ते लंबित मामलों की चुनौती का सामना कर रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 की शुरुआत तक सुप्रीम कोर्ट में 92,000 से अधिक मामले लंबित थे। वहीं हर वर्ष नए मामलों की संख्या निपटाए गए मामलों से अधिक दर्ज की जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी, जटिल कानूनी विवादों और संवैधानिक मामलों में वृद्धि के कारण सर्वोच्च न्यायालय पर कार्यभार लगातार बढ़ा है। ऐसे में अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति से अतिरिक्त पीठों (Benches) का गठन संभव होगा, जिससे सुनवाई की गति बढ़ सकती है।

सरकार का तर्क है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से संवैधानिक मामलों, नागरिक अधिकारों से जुड़े विवादों और अपीलों की सुनवाई में लगने वाला समय कम किया जा सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या समय के साथ कैसे बढ़ी?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत संसद को सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है। स्वतंत्रता के बाद न्यायालय की स्थापना के समय न्यायाधीशों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी, लेकिन बढ़ती आवश्यकताओं के अनुसार इसमें समय-समय पर वृद्धि की गई। इतिहास पर नजर डालें तो:

  • 1956: 10 न्यायाधीश
  • 1960: 13 न्यायाधीश
  • 1977: 17 न्यायाधीश
  • 1986: 25 न्यायाधीश
  • 2008: 30 न्यायाधीश
  • 2019: 33 न्यायाधीश
  • 2026: 37 न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त)

यह वृद्धि दर्शाती है कि न्यायिक प्रणाली को बदलती परिस्थितियों और बढ़ते मामलों के अनुरूप लगातार विस्तारित किया जाता रहा है।

सरकार का दावा: न्याय वितरण प्रणाली होगी अधिक प्रभावी

केंद्र सरकार के अनुसार यह संशोधन न्यायिक सुधारों की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। सरकार का कहना है कि अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से:

  • अधिक न्यायिक पीठों का गठन संभव होगा।
  • लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी।
  • संवैधानिक पीठों की नियमित सुनवाई सुनिश्चित होगी।
  • नागरिकों को समयबद्ध न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी।
  • सर्वोच्च न्यायालय की कार्यक्षमता में सुधार होगा।

सरकार ने यह भी कहा है कि केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि मध्यस्थता (Mediation), आर्बिट्रेशन (Arbitration) और अन्य वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणालियों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम हो सके।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

इस विधेयक को लेकर सबसे बड़ा विवाद इसके विधायी स्वरूप को लेकर सामने आया। सरकार ने इससे पहले मई 2026 में एक अध्यादेश जारी कर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया था। संविधान के अनुसार, जब संसद का सत्र नहीं चल रहा हो और तत्काल कानून बनाने की आवश्यकता हो, तब सरकार अध्यादेश जारी कर सकती है। हालांकि अध्यादेश को बाद में संसद की मंजूरी प्राप्त करना आवश्यक होता है।

विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि जब अधिकांश राजनीतिक दल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के पक्ष में थे, तब अध्यादेश लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। उनका तर्क था कि सरकार इस विषय पर सामान्य संसदीय प्रक्रिया का पालन कर सकती थी।

मनी बिल को लेकर विवाद क्यों हुआ?

विधेयक को मनी बिल के रूप में पेश किए जाने पर भी व्यापक बहस हुई। भारतीय संविधान के अनुसार मनी बिल मुख्य रूप से कराधान, सरकारी उधारी, सार्वजनिक निधियों और सरकारी व्यय से संबंधित मामलों पर लागू होता है। सरकार का तर्क था कि अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से वेतन, आवास, स्टाफ और प्रशासनिक खर्च बढ़ेंगे, जिनका वहन भारत की संचित निधि से किया जाएगा। इसलिए इसे मनी बिल के रूप में प्रस्तुत करना उचित है।

हालांकि विपक्ष ने इस तर्क का विरोध किया। उनका कहना था कि यह केवल वित्तीय व्यय का मामला नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की संरचना और संस्थागत व्यवस्था में बदलाव से भी जुड़ा विषय है। इसलिए इसे सामान्य विधेयक के रूप में पेश कर दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा कराई जानी चाहिए थी। यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में आधार कानून, धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) और कुछ अन्य कानूनों को मनी बिल के रूप में पारित किए जाने पर पहले भी संवैधानिक बहस हो चुकी है।

क्या केवल चार नए जजों से समस्या का समाधान होगा?

कई विपक्षी नेताओं और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक लंबित मामलों की समस्या केवल सुप्रीम कोर्ट तक सीमित नहीं है। भारत की जिला अदालतों और उच्च न्यायालयों में करोड़ों मामले लंबित हैं। आलोचकों का कहना है कि चार अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति एक सकारात्मक कदम हो सकती है, लेकिन इससे न्यायिक व्यवस्था की सभी चुनौतियां समाप्त नहीं होंगी। न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ-साथ न्यायिक बुनियादी ढांचे, कोर्टरूम, डिजिटल सुविधाओं और न्यायिक कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने की भी आवश्यकता है।

इसके अलावा न्यायपालिका में महिलाओं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अन्य सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व को लेकर भी बहस जारी है।

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