एक हफ्ते के भीतर यह तीसरी बार है, जब सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत से दोषी ठहराए गए आरोपी को बरी कर दिया है। ताजा मामला अपहरण और हत्या से जुड़ा है, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने सबूतों के विश्लेषण पर सवाल उठाए।
नई दिल्ली: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले एक सप्ताह के दौरान तीन अलग-अलग आपराधिक मामलों में निचली अदालतों और हाई कोर्ट के फैसलों को पलटते हुए दोषियों को बरी किया है। इन मामलों में अपहरण और हत्या, नाबालिग से यौन अपराध तथा हत्या के आरोप शामिल हैं। तीनों मामलों में सर्वोच्च अदालत के सामने अभियोजन पक्ष के सबूतों को लेकर गंभीर सवाल उठे।
अदालत के फैसलों में एक बात समान रही—अभियोजन पक्ष आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद सबूत पेश नहीं कर सका। सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में सबूतों की कड़ियों, जांच की कमियों और गवाहों के बयानों का विस्तार से परीक्षण किया।
तेलंगाना का अपहरण और हत्या का मामला
सबसे ताजा मामला वर्ष 2012 में तेलंगाना में हुए अपहरण और हत्या से जुड़ा था। मामले के अनुसार, एक व्यक्ति का अपहरण करने के बाद उसके पिता से 23 लाख रुपये की फिरौती मांगी गई थी। परिवार केवल 1.5 लाख रुपये की रकम जुटा सका। इसके बाद अपहृत व्यक्ति की हत्या कर दी गई। जांच के दौरान बताया गया कि शव को एक फ्लैट के अंदर रखे फ्रिज में छिपाया गया था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपियों में से एक की मौत हो गई।
ट्रायल कोर्ट ने बाकी पांच आरोपियों को दोषी करार दिया था। बाद में तेलंगाना हाई कोर्ट ने मामले में सबूतों की समीक्षा करते हुए चार आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि एक आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने अभियोजन पक्ष की कहानी और उपलब्ध सबूतों का दोबारा परीक्षण किया।
हत्या से जोड़ने वाला ठोस सबूत नहीं
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह संकेत मिलता है कि पीड़ित की मौत दम घुटने और गला घोंटने के कारण हुई थी। शव के फ्लैट में फ्रिज के भीतर पाए जाने की बात भी रिकॉर्ड में थी।हालांकि, अदालत के अनुसार इन परिस्थितियों के अलावा ऐसा विश्वसनीय सबूत मौजूद नहीं था, जो आरोपी को हत्या या संबंधित फ्लैट से सीधे तौर पर जोड़ सके। इसी आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
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17 साल जेल में रहने के बाद मिली रिहाई
दूसरा मामला एक बच्चे के साथ कथित यौन अपराध और हत्या से संबंधित था। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी ने स्नैक्स का लालच देकर बच्चे को अपने साथ ले जाकर अपराध किया था। अंबाला की अदालत ने मार्च 2007 में आरोपी को दोषी ठहराया और अप्रैल 2010 में अप्राकृतिक यौन संबंध और हत्या के आरोपों में उम्रकैद की सजा सुनाई। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2022 में उसकी अपील खारिज कर दी थी।
बाद में सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई हुई। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने सबूतों की जांच के बाद दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया।
DNA जांच नहीं होने पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि आरोपी के अंडरगारमेंट से मिले कथित सीमेन का DNA परीक्षण नहीं कराया गया। इससे यह स्पष्ट नहीं हो सका कि उसका मिलान पीड़ित के कपड़ों से लिए गए रेक्टल स्वैब से होता है या नहीं। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन की 'आखिरी बार साथ देखे जाने' वाली थ्योरी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं थी।
मामले की परिस्थितियों को जोड़ने वाली कई महत्वपूर्ण कड़ियां अनुपस्थित थीं। आरोपी ने करीब 17 वर्ष जेल में बिताए। सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बाद मामले में किसी व्यक्ति को उस अपराध के लिए सजा नहीं मिली।
बिहार के पुराने हत्या मामले में भी राहत
तीसरे मामले में बिहार में करीब 25 वर्ष पुराने हत्या केस की सुनवाई हुई। ट्रायल कोर्ट और पटना हाई कोर्ट ने छह लोगों को दोषी ठहराया था। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद सभी दोषियों को बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन का मामला पर्याप्त सबूतों पर आधारित नहीं था और कथित चश्मदीद गवाहों के बयानों पर भरोसा करना मुश्किल था। अदालत की टिप्पणी थी कि यह सिर्फ खराब जांच का मामला नहीं, बल्कि प्रभावी जांच के अभाव का मामला दिखाई देता है।









