तानों से विश्व चैंपियन तक: ‘जोकर’ कहे गए अर्जुन परमार ने जीता योगासन विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल

अजमेर के अर्जुन परमार ने वर्ल्ड योगासन चैंपियनशिप 2026 में गोल्ड मेडल जीतकर सफलता हासिल की। कभी टीचर्स और दोस्तों के तानों का सामना करने वाले अर्जुन आज युवाओं

अजमेर के अर्जुन परमार ने वर्ल्ड योगासन चैंपियनशिप 2026 में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। कभी टीचर्स और दोस्तों के तानों का सामना करने वाले अर्जुन ने संघर्ष, मेहनत और परिवार के सहयोग से सफलता की नई मिसाल कायम की।

अजमेर: भारत में योग को केवल स्वास्थ्य और आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में ही नहीं, बल्कि एक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में भी तेजी से पहचान मिल रही है। इसी बदलते परिदृश्य के बीच राजस्थान के अजमेर से एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। यह कहानी है 23 वर्षीय योग खिलाड़ी अर्जुन परमार की, जिन्होंने कभी उपहास, आलोचना और आर्थिक चुनौतियों का सामना किया, लेकिन हार नहीं मानी और आज विश्व योगासन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है।

अर्जुन ने जून 2026 में अहमदाबाद में आयोजित वर्ल्ड योगासन चैंपियनशिप में सीनियर वर्ग (18-28 वर्ष) में गोल्ड मेडल जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उनकी यात्रा केवल खेल उपलब्धियों की कहानी नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास, परिवार के समर्थन और निरंतर मेहनत का उदाहरण भी है।

जब स्कूल में प्रतिभा का मजाक उड़ाया गया

अर्जुन की सफलता के पीछे एक लंबा संघर्ष छिपा है। किशोरावस्था में जब उन्होंने स्कूल के कार्यक्रमों में कठिन योगासन और शारीरिक संतुलन से जुड़े प्रदर्शन करने शुरू किए, तब उन्हें प्रोत्साहन से अधिक आलोचना मिली उनके अनुसार कुछ शिक्षक इसे गंभीर खेल या कला मानने के बजाय “सर्कस” कहकर संबोधित करते थे। वहीं कई सहपाठी उनका मजाक उड़ाते और उन्हें “जोकर” कहकर पुकारते थे। लगातार मिलने वाले ऐसे तानों ने उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित किया। कई बार उन्होंने अपने सपनों को छोड़ने का भी विचार किया, लेकिन परिवार का भरोसा और आत्मविश्वास उन्हें आगे बढ़ाता रहा। आज वही लोग उनकी उपलब्धियों की सराहना करते हैं, जिन्होंने कभी उनकी आलोचना की थी।

जिम्नास्टिक की चोट ने बदल दी जिंदगी

अर्जुन की खेल यात्रा की शुरुआत योग से नहीं, बल्कि जिम्नास्टिक से हुई थी। उन्होंने लगभग 11 वर्ष की आयु में जिम्नास्टिक का प्रशिक्षण शुरू किया और राज्य स्तर तक प्रतियोगिताओं में भाग लिया। हालांकि 13 वर्ष की आयु में एक कठिन जिम्नास्टिक मूव के दौरान उन्हें गंभीर चोट लग गई। इस चोट ने उनके खेल करियर को संकट में डाल दिया। डॉक्टरों ने शरीर की रिकवरी और रीढ़ की मजबूती के लिए योग अपनाने की सलाह दी। यहीं से उनके जीवन ने नया मोड़ लिया। उपचार के उद्देश्य से शुरू किया गया योग धीरे-धीरे उनका जुनून बन गया और बाद में यही उनकी पहचान बन गया।

योग को बनाया करियर, शिक्षा भी इसी क्षेत्र में

योग के प्रति बढ़ती रुचि के साथ अर्जुन ने इसे केवल शौक तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद योग विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का निर्णय लिया। अजमेर स्थित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय (एमडीएस यूनिवर्सिटी) से योग विषय में स्नातक की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने पूर्णकालिक रूप से योग को अपना करियर बना लिया। उनका मानना है कि आधुनिक समय में योग केवल पारंपरिक अभ्यास नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और पेशेवर क्षेत्र के रूप में विकसित हो रहा है, जिसमें युवाओं के लिए व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।

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परिवार ने हर कठिन दौर में दिया साथ

किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और अर्जुन की कहानी भी इससे अलग नहीं है। उनके पिता नारायण लाल परमार फर्नीचर व्यवसाय से जुड़े हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद परिवार ने अर्जुन के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया।

अर्जुन बताते हैं कि कई बार प्रतियोगिताओं में भाग लेने, विशेष कॉस्ट्यूम खरीदने और प्रशिक्षण संबंधी खर्चों के लिए आर्थिक कठिनाइयां सामने आईं। ऐसे समय में उनके पिता ने उधार लेकर भी उनकी जरूरतें पूरी कीं। उनका कहना है कि यदि परिवार का समर्थन नहीं मिलता तो शायद वे आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते।

कठिन अभ्यास और चोटों के बीच बना विश्वस्तरीय खिलाड़ी

योगासन प्रतियोगिताओं में सफलता केवल लचीलेपन का परिणाम नहीं होती, बल्कि इसके पीछे वर्षों की कठिन साधना और अनुशासन छिपा होता है। अर्जुन के अनुसार उन्होंने योग की उन्नत तकनीकें और जटिल आसन अपने प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में सीखे। वर्तमान में वे 500 से अधिक योगासन और विविध शारीरिक संतुलन तकनीकों का अभ्यास कर चुके हैं।

इस दौरान उन्हें कई बार चोटों का सामना भी करना पड़ा। प्रशिक्षण के दौरान हुई दुर्घटनाओं के कारण उन्हें शारीरिक तकलीफें झेलनी पड़ीं, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिस्पर्धी योगासन में शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक दृढ़ता भी उतनी ही आवश्यक होती है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर शानदार उपलब्धियां

लगातार अभ्यास और समर्पण का परिणाम यह रहा कि अर्जुन ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं। अब तक उनके नाम 14 राष्ट्रीय स्वर्ण पदक और 2 अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक दर्ज हैं। इसके अलावा उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में रजत पदक भी जीते हैं। अहमदाबाद में आयोजित विश्व योगासन चैंपियनशिप 2026 में स्वर्ण पदक जीतना उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। इस सफलता ने उन्हें वैश्विक योग समुदाय में नई पहचान दिलाई है।

युवाओं के लिए योग का संदेश

अर्जुन का मानना है कि आज की पीढ़ी कई नई चुनौतियों का सामना कर रही है, जिनमें डिजिटल लत, तनाव और मानसिक दबाव प्रमुख हैं। वे बताते हैं कि नियमित योग और प्राणायाम अभ्यास एकाग्रता बढ़ाने तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। विशेष रूप से अनुलोम-विलोम, नाड़ी शोधन, भ्रामरी और उज्जायी जैसे प्राणायाम तनाव कम करने और मन को शांत रखने में प्रभावी माने जाते हैं। हालांकि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि योग किसी समस्या का जादुई समाधान नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

स्वास्थ्य लाभों पर भी दिया जोर

अर्जुन के अनुसार योग केवल खेल नहीं, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य प्रणाली है। उनका मानना है कि नियमित योगाभ्यास शरीर की लचक बढ़ाने, मांसपेशियों को मजबूत करने और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वे विशेष रूप से बैक-बेंडिंग योगासनों का उल्लेख करते हैं, जो रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाने और शरीर में लचीलापन बढ़ाने में सहायक होते हैं। इसके अलावा कुछ योगासन और प्राणायाम रक्तचाप नियंत्रण, तनाव प्रबंधन और बेहतर पाचन में भी मददगार माने जाते हैं। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी चिकित्सीय स्थिति में योग को पेशेवर चिकित्सा सलाह के साथ ही अपनाना चाहिए।

सफलता से बड़ा है संघर्ष का संदेश

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर अर्जुन युवाओं को एक महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। उनका कहना है कि जीवन में लोग आपके सपनों पर सवाल उठाएंगे, आपका मजाक उड़ाएंगे और आपको हतोत्साहित करने की कोशिश करेंगे। लेकिन यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत निरंतर जारी रहे, तो वही आलोचनाएं एक दिन प्रेरणा में बदल जाती हैं।

अर्जुन परमार की यात्रा यह साबित करती है कि सफलता केवल प्रतिभा का परिणाम नहीं होती, बल्कि विश्वास, धैर्य और निरंतर प्रयास का प्रतिफल होती है। कभी “जोकर” कहे जाने वाले इस युवा खिलाड़ी ने आज विश्व मंच पर भारत का तिरंगा ऊंचा कर यह दिखा दिया है कि दृढ़ संकल्प के सामने उपहास और कठिनाइयां टिक नहीं सकतीं।

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