यमुनानगर में तालाबों और जोहड़ों की बदहाल स्थिति से भूजल संकट गहराता जा रहा है। जिले के 805 तालाबों में से 592 प्रदूषित हैं, करीब 500 अतिक्रमण की चपेट में हैं और 69 पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे वर्षा जल संचयन प्रभावित हो रहा है।
यमुनानगर: जिले में तालाबों और जोहड़ों पर बढ़ते अतिक्रमण, प्रदूषण और रखरखाव की कमी का असर अब भूजल स्तर पर साफ दिखाई देने लगा है। जल संरक्षण के पारंपरिक स्रोत माने जाने वाले सैकड़ों तालाब या तो सूख चुके हैं या गंदगी और अवैध कब्जों की चपेट में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गंभीर हो सकता है।
तालाबों की बदहाली से बढ़ा जल संकट
यमुनानगर जिले में जल संरक्षण के प्रमुख स्रोत रहे तालाब और जोहड़ लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जिले में कुल 805 तालाब चिन्हित हैं, जिनमें से 592 प्रदूषित हो चुके हैं। इसके अलावा करीब 500 तालाब अतिक्रमण की चपेट में हैं, जबकि 256 जलाशयों पर गंभीर स्तर का कब्जा बताया गया है।
![]()
स्थिति इतनी चिंताजनक हो चुकी है कि 69 तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं और 20 से अधिक जलाशय अस्तित्व ही खो चुके हैं। कई स्थानों पर तालाबों की भूमि पर निर्माण कार्य कर दिए गए हैं, जिससे उनकी मूल संरचना प्रभावित हुई है।
वर्षा जल संचयन पर पड़ा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि तालाब और जोहड़ वर्षा जल संचयन की प्राकृतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। पहले बारिश का पानी इन जलाशयों में एकत्र होकर धीरे-धीरे जमीन में समाता था, जिससे भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद मिलती थी।
लेकिन अब गाद भरने, प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण इनकी जलधारण क्षमता कम हो गई है। नतीजतन वर्षा का अधिकांश पानी नालों और ड्रेनों के माध्यम से बहकर निकल जाता है और भूजल रिचार्ज की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
कई ब्लॉकों में लगातार गिर रहा भूजल स्तर
भूजल विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जिले के कई क्षेत्रों में हर वर्ष औसतन एक से डेढ़ फीट तक भूजल स्तर नीचे जा रहा है। व्यासपुर ब्लॉक की स्थिति सबसे अधिक गंभीर मानी जा रही है, जहां पानी 25 मीटर की गहराई पर पहुंच चुका है।
रादौर में भूजल 18 मीटर, सरस्वतीनगर और प्रतापनगर में 15-15 मीटर, जगाधरी में लगभग 14.5 मीटर, साढौरा में 11 मीटर और छछरौली में करीब नौ मीटर गहराई पर उपलब्ध है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल संरक्षण के उपायों को प्राथमिकता नहीं दी गई तो भविष्य में स्थिति और खराब हो सकती है।
अटल भूजल योजना में शामिल किए गए चार ब्लॉक
गिरते भूजल स्तर को देखते हुए रादौर, जगाधरी, सरस्वतीनगर और साढौरा ब्लॉकों को अटल भूजल योजना के तहत शामिल किया गया है। इन चारों ब्लॉकों की 251 ग्राम पंचायतों में जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन से जुड़े कार्यों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इन क्षेत्रों का चयन इसलिए किया गया क्योंकि यहां भूजल का दोहन अधिक है, जबकि प्राकृतिक पुनर्भरण की दर अपेक्षाकृत कम है।
करोड़ों खर्च के बावजूद अधूरे हैं कई काम
तालाबों के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए अमृत सरोवर योजना के तहत जिले में अब तक 42.16 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद कई परियोजनाएं अभी अधूरी हैं।
जानकारी के अनुसार 20 से अधिक परियोजनाएं लंबित हैं। नगर निगम क्षेत्र के 45 तालाबों पर विकास कार्य प्रस्तावित थे, लेकिन अब तक केवल दो परियोजनाओं का काम पूरा हो पाया है। इससे योजनाओं के क्रियान्वयन की गति पर भी सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रही परेशानी
ग्रामीणों का कहना है कि पहले तालाब और जोहड़ गांवों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हुआ करते थे। वर्षा का पानी लंबे समय तक इनमें जमा रहता था, जिससे आसपास के क्षेत्रों में नमी बनी रहती थी और पशुओं को भी पानी उपलब्ध होता था।
अब अधिकांश तालाब या तो सूखे पड़े हैं या उनमें प्रदूषित पानी भरा है। इसका असर न केवल ग्रामीणों पर बल्कि पशुपालकों पर भी पड़ रहा है। कई गांवों में गर्मी के मौसम में जल संकट पहले की तुलना में अधिक महसूस किया जा रहा है।
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहे विशेषज्ञों का कहना है कि तालाब केवल जल संग्रहण का साधन नहीं हैं, बल्कि भूजल रिचार्ज की प्राकृतिक प्रणाली का अहम हिस्सा हैं। यदि इनके संरक्षण और पुनर्जीवन पर गंभीरता से काम नहीं किया गया तो आने वाले समय में जिले को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों ने अतिक्रमण हटाने, तालाबों की सफाई, गाद निकालने और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए व्यापक अभियान चलाने की आवश्यकता बताई है, ताकि भूजल स्तर को स्थिर रखा जा सके और भविष्य की जल जरूरतों को सुरक्षित किया जा सके।









