कलकत्ता हाई कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बार-बार एफआईआर दर्ज किए जाने को लेकर सोमवार को पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई।
Abhishek Banerjee FIR Case: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ लगातार दर्ज हो रही एफआईआर को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है। तीन एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने संकेत दिया कि यदि इसी तरह नए मामले दर्ज होते रहे तो वह राज्य सरकार को अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कोई नई एफआईआर दर्ज करने से पहले अदालत की अनुमति लेने का निर्देश दे सकती है।
मामले की सुनवाई जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की पीठ में हुई। अदालत ने इन तीन मामलों में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई से मिली अंतरिम सुरक्षा को भी जारी रखा। कोर्ट ने कहा कि जांच पर रोक लगाने की जरूरत नहीं है, लेकिन केवल पूछताछ के लिए किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना आवश्यक नहीं माना जा सकता।
लगातार एफआईआर पर कोर्ट की नाराजगी
अभिषेक बनर्जी की ओर से तीन अलग-अलग एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है। ये मामले 4 जुलाई, 11 जुलाई और 23 जुलाई को दर्ज किए गए थे। इन शिकायतों का संबंध मुख्य रूप से ‘सेबाश्रय’ नाम की सामुदायिक स्वास्थ्य पहल से जुड़े कथित अनियमितताओं के आरोपों से है। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि 4 जुलाई और 11 जुलाई को दर्ज दो शिकायतों का विषय काफी हद तक एक जैसा था। इनमें से एक शिकायत अभिजीत दास उर्फ बॉबी की ओर से दर्ज कराई गई थी, जबकि दूसरी शिकायत एक अन्य व्यक्ति ने की थी।
जस्टिस भट्टाचार्य ने सुनवाई के दौरान कहा कि वह मई 2026 से इन मामलों को देख रहे हैं और अब स्थिति उन्हें परेशान करने लगी है। अदालत ने संकेत दिया कि वह भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी से जुड़े एक अन्य मामले में समकक्ष पीठ के आदेश को ध्यान में रखते हुए व्यापक स्तर पर रोक लगाने पर विचार कर सकती है।
‘अब बहुत हो चुका’
सुनवाई के दौरान जस्टिस भट्टाचार्य ने बार-बार एफआईआर दर्ज होने को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। अदालत ने संकेत दिया कि यदि एक ही व्यक्ति के खिलाफ लगातार समान प्रकृति की शिकायतें आती रहती हैं, तो न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी हो सकता है। कोर्ट ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी आरोप की जांच के खिलाफ नहीं है। अदालत के मुताबिक, यदि किसी घटना में कानून का उल्लंघन हुआ है तो पुलिस जांच कर सकती है और जरूरत पड़ने पर आरोपपत्र भी दाखिल किया जा सकता है।
‘सेबाश्रय’ को लेकर क्या हैं आरोप?
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पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार ने ‘सेबाश्रय’ से जुड़े कई आरोप अदालत के सामने रखे। राज्य सरकार का दावा है कि कुछ केंद्रों पर कथित तौर पर एक्सपायर्ड दवाओं का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा, सरकार ने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य पहल का संचालन Clinical Establishments Act से जुड़े नियमों के अनुरूप नहीं किया गया।
राज्य की ओर से यह आरोप भी रखा गया कि इन केंद्रों पर लिंग निर्धारण से संबंधित जांच की गई। इन आरोपों को अदालत के सामने जांच के आधार के रूप में रखा गया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों की प्रकृति सामान्य दिखाई देती है और अभी तक ऐसा सीधा संबंध स्पष्ट नहीं है, जिससे इन घटनाओं के लिए अभिषेक बनर्जी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी स्थापित हो।
कोर्ट का सवाल- अभिषेक बनर्जी से क्या संबंध?
जस्टिस भट्टाचार्य ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि किसी स्वास्थ्य केंद्र पर मेडिकल लापरवाही हुई है, तो उसका सीधा संबंध अभिषेक बनर्जी से कैसे जोड़ा जा सकता है। अदालत ने कहा कि अगर किसी डॉक्टर या स्वास्थ्य सेवा से जुड़े व्यक्ति की लापरवाही सामने आती है तो पुलिस उस पहलू की जांच कर सकती है।
लेकिन केवल इस आधार पर किसी राजनीतिक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करना उचित नहीं होगा, जब तक उसके खिलाफ प्रत्यक्ष भूमिका का कोई आधार सामने न आए।
अभिजीत दास की शिकायतों पर भी चर्चा
सुनवाई में अभिजीत दास उर्फ बॉबी की ओर से दर्ज शिकायतों का मुद्दा भी उठा। अदालत ने इस बात पर सवाल किया कि क्या एक ही व्यक्ति द्वारा बार-बार शिकायतें दर्ज कराने के पीछे कोई विशेष कारण है। राज्य सरकार ने दास को ‘व्हिसलब्लोअर’ बताते हुए उनकी शिकायतों को गंभीरता से लेने की दलील दी। वहीं, दास की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत नारायण चटर्जी ने कहा कि किसी व्यक्ति के चुनाव हारने से उसका शिकायत दर्ज कराने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। उन्होंने आरोपों को गंभीर बताते हुए जांच जारी रखने की मांग की और कहा कि किसी नागरिक को शिकायत करने से नहीं रोका जाना चाहिए।










