अमेरिका में मध्यावधि चुनावों से पहले इजरायल समर्थक लॉबी AIPAC के बड़े चुनावी खर्च को लेकर बहस तेज है। संगठन ने कई डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के समर्थन में करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं, लेकिन मिशिगन जैसे चुनावी नतीजों ने उसके प्रभाव पर सवाल खड़े किए हैं।
वॉशिंगटन: अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले इजरायल समर्थक प्रभावशाली लॉबी समूह अमेरिकन इजरायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी यानी AIPAC की चुनावी रणनीति चर्चा में है। समूह और उससे जुड़े संगठनों ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के समर्थन और विरोध में करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं। हालांकि, इस भारी राजनीतिक खर्च के साथ AIPAC को बढ़ते जनमत विरोध और अपने चुनावी समर्थन के संभावित नकारात्मक असर का भी सामना करना पड़ रहा है।
AIPAC की रणनीति पर क्यों हो रही चर्चा?
AIPAC लंबे समय से अमेरिकी कांग्रेस में इजरायल के समर्थन को मजबूत करने के लिए काम करने वाला प्रमुख लॉबी समूह रहा है। संगठन का घोषित उद्देश्य अमेरिकी कांग्रेस में इजरायल के प्रति समर्थन बनाए रखना है। चुनावों के दौरान यह समूह उन उम्मीदवारों को समर्थन देता है जिन्हें वह इजरायल समर्थक नीतियों के लिए उपयुक्त मानता है।
हाल के चुनावों में AIPAC और उससे जुड़े राजनीतिक संगठनों ने उम्मीदवारों के समर्थन में बड़े पैमाने पर खर्च किया है। दिलचस्प बात यह है कि कई मामलों में विरोधी उम्मीदवारों के खिलाफ चलाए गए विज्ञापनों में सीधे इजरायल या गाजा युद्ध का उल्लेख नहीं किया गया। इसके बजाय घरेलू नीतियों, राजनीतिक रिकॉर्ड और अन्य मुद्दों को चुनावी संदेश का केंद्र बनाया गया।
जमाल बोमन के खिलाफ रिकॉर्ड खर्च
AIPAC की रणनीति का चर्चित उदाहरण न्यूयॉर्क के पूर्व सांसद जमाल बोमन का मामला है। बोमन ने 2020 में कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ने से पहले AIPAC के साथ बैठक का निमंत्रण ठुकरा दिया था। बाद में वह कांग्रेस में इजरायल की नीतियों के प्रमुख आलोचकों में शामिल हो गए।
2024 के डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनाव में बोमन के खिलाफ AIPAC से जुड़े राजनीतिक संगठन यूनाइटेड डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट यानी UDP ने करीब 1.45 करोड़ डॉलर खर्च किए। यह उस समय संगठन की ओर से किसी उम्मीदवार के खिलाफ विज्ञापन अभियान पर किया गया रिकॉर्ड खर्च बताया गया।
बोमन के मुताबिक, इन विज्ञापनों में इजरायल का मुद्दा लगभग सामने नहीं आया। उनका कहना था कि विज्ञापनों में उन्हें डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए अनुपयुक्त दिखाने की कोशिश की गई और घरेलू राजनीतिक मुद्दों को प्रमुखता दी गई। आखिरकार बोमन चुनाव हार गए और उनकी सीट एक इजरायल समर्थक डेमोक्रेट के पास चली गई। AIPAC ने इस परिणाम को अपनी सफलता के तौर पर पेश किया और बोमन को इजरायल विरोधी चरमपंथी बताया।
AIPAC का दावा, ज्यादातर समर्थित उम्मीदवार जीते
2024 के चुनाव के बाद AIPAC की ओर से जारी एक मेमो में दावा किया गया कि संगठन द्वारा समर्थित 98 प्रतिशत उम्मीदवार अपने चुनाव जीतने में सफल रहे। संगठन के मुताबिक, उसके सदस्यों ने उम्मीदवारों को समर्थन देने के लिए 5.3 करोड़ डॉलर से अधिक का योगदान दिया। यह आंकड़ा बताता है कि अमेरिकी चुनावों में AIPAC और उससे जुड़े राजनीतिक नेटवर्क की वित्तीय भूमिका कितनी बड़ी हो चुकी है। हालांकि, इस प्रभाव के साथ समूह की राजनीतिक रणनीतियों को लेकर आलोचना भी बढ़ रही है।
AIPAC के आलोचकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर राजनीतिक खर्च उम्मीदवारों और चुनावी बहस को प्रभावित कर सकता है। वहीं, संगठन का पक्ष रखने वाले लोग इसे अमेरिकी राजनीतिक प्रक्रिया में वैध भागीदारी और इजरायल-अमेरिका संबंधों के समर्थन के रूप में देखते हैं।
अमेरिका में इजरायल को लेकर बदल रहा जनमत
AIPAC के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी जनता के बीच इजरायल को लेकर बदलती राय भी मानी जा रही है। खासकर डेमोक्रेटिक मतदाताओं और युवा अमेरिकियों के बीच इजरायल की नीतियों को लेकर आलोचना बढ़ी है। अप्रैल 2026 में हुए एक Pew Research सर्वे के मुताबिक, 60 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने इजरायल के प्रति नकारात्मक राय व्यक्त की। यह आंकड़ा एक साल पहले 53 प्रतिशत था। डेमोक्रेट और डेमोक्रेटिक झुकाव वाले स्वतंत्र मतदाताओं के बीच नकारात्मक राय 80 प्रतिशत तक पहुंच गई।
बदलते जनमत के बीच AIPAC समर्थित उम्मीदवारों के साथ जुड़ना कुछ डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। यही वजह है कि कुछ चुनावी अभियानों में AIPAC का समर्थन खुद विरोधी उम्मीदवारों के लिए राजनीतिक मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।
मिशिगन में अब्दुल अल-सईद ने दिया झटका
मिशिगन का डेमोक्रेटिक सीनेट प्राइमरी चुनाव AIPAC के प्रभाव की एक महत्वपूर्ण परीक्षा के तौर पर देखा गया। AIPAC और उससे जुड़े संगठनों ने मध्यमार्गी उम्मीदवार हेली स्टीवंस के समर्थन में 3 करोड़ डॉलर से अधिक खर्च किया। उनका मुकाबला इजरायल की नीतियों के आलोचक अब्दुल अल-सईद से था। AIPAC समर्थित विज्ञापनों में इजरायल के बजाय स्टीवंस के घरेलू राजनीतिक रिकॉर्ड और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ उनके संबंधों को प्रमुखता दी गई।

इसके बावजूद अल-सईद ने स्टीवंस को करीबी मुकाबले में हरा दिया। यह परिणाम AIPAC के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना गया, क्योंकि संगठन ने स्टीवंस के समर्थन में भारी रकम खर्च की थी। अल-सईद ने AIPAC के खर्च को अपने अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने इसे इजरायल को अमेरिकी सैन्य सहायता से जोड़ते हुए मतदाताओं के सामने सवाल खड़ा किया कि चुनाव में इतना पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है।
मिशिगन में AIPAC समर्थन का उल्टा असर?
मिशिगन में AIPAC के समर्थन को लेकर हुए एक स्थानीय सर्वे ने भी संगठन के लिए चिंता बढ़ाई। डेमोक्रेटिक प्राइमरी मतदाताओं से पूछा गया कि AIPAC समर्थित उम्मीदवार के प्रति उनका रुख कैसा होगा। सर्वे में 40.6 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि AIPAC का समर्थन मिलने से वे ऐसे उम्मीदवार को वोट देने के लिए कम इच्छुक होंगे। केवल 3 प्रतिशत ने कहा कि इससे उनकी उम्मीदवार को वोट देने की संभावना बढ़ेगी, जबकि 47.1 प्रतिशत ने कहा कि इससे उनके निर्णय पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मिशिगन में बड़ी अरब-अमेरिकी आबादी होने के कारण इजरायल और गाजा से जुड़े मुद्दे यहां डेमोक्रेटिक राजनीति में विशेष महत्व रखते हैं।
इलिनॉय में भी सामने आई AIPAC की रणनीति
इलिनॉय के डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनावों में भी AIPAC की भूमिका चर्चा में रही। शिकागो क्षेत्र की चार महत्वपूर्ण सीटों के लिए 46 डेमोक्रेटिक उम्मीदवार मैदान में थे। AIPAC ने इन सीटों पर अपने पसंदीदा उम्मीदवारों का समर्थन किया।
स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग सभी उम्मीदवारों से इजरायल को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता पर सवाल किए गए थे। कई उम्मीदवारों ने सहायता पर सख्त शर्तों की आवश्यकता और गाजा में इजरायल की कार्रवाई की आलोचना की थी। हालांकि, AIPAC समर्थित चार उम्मीदवारों ने इन सवालों पर स्पष्ट हां या ना में जवाब देने से परहेज किया। इन चार उम्मीदवारों के समर्थन में AIPAC और उससे जुड़े संगठनों ने लाखों डॉलर खर्च किए। आखिरकार चार में से दो उम्मीदवार अपनी-अपनी प्राइमरी जीतने में सफल रहे।
शेल संगठनों के जरिए खर्च का आरोप
AIPAC की चुनावी रणनीति का एक और विवादित पहलू राजनीतिक विज्ञापन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले संगठनों को लेकर है। आलोचकों का आरोप है कि AIPAC से जुड़ा पैसा ऐसे समूहों के जरिए खर्च किया जाता है जिनके नाम सीधे AIPAC से जुड़े हुए नहीं दिखाई देते। शिकागो के कुछ चुनावों में Elect Chicago Women और Affordable Chicago Now जैसे संगठनों के नाम सामने आए। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के नाम मतदाताओं को खर्च के वास्तविक स्रोत को समझने में मुश्किल पैदा कर सकते हैं।
AIPAC के समर्थकों का तर्क है कि राजनीतिक संगठनों और उम्मीदवारों का समर्थन करना अमेरिकी कानून के तहत वैध चुनावी गतिविधि है। वहीं, आलोचक चुनावी वित्त व्यवस्था में पारदर्शिता और बड़े राजनीतिक खर्च की भूमिका पर सवाल उठाते हैं।
मध्यावधि चुनाव में AIPAC के सामने बड़ी चुनौती
आगामी अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले AIPAC के सामने दोहरी चुनौती दिखाई दे रही है। एक तरफ संगठन के पास बड़ा राजनीतिक और वित्तीय नेटवर्क है, जो उम्मीदवारों के समर्थन में भारी खर्च करने की क्षमता रखता है। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर इजरायल और गाजा को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। AIPAC का प्रभाव कुछ चुनावों में निर्णायक साबित हुआ है, लेकिन मिशिगन जैसे मुकाबलों ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या संगठन का समर्थन हर जगह उम्मीदवार के लिए फायदेमंद रहता है।
आने वाले मध्यावधि चुनाव यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि अमेरिकी मतदाता AIPAC जैसे प्रभावशाली लॉबी समूहों के चुनावी समर्थन को किस तरह देखते हैं। यदि इजरायल को लेकर जनमत में बदलाव जारी रहता है, तो अमेरिकी राजनीति में AIPAC की पारंपरिक रणनीति को भी नए राजनीतिक माहौल के अनुसार बदलना पड़ सकता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि AIPAC अमेरिकी चुनावी राजनीति में एक प्रभावशाली संगठन बना हुआ है, लेकिन उसके बड़े खर्च और इजरायल से जुड़े मुद्दों को लेकर बदलती मतदाता राय के बीच आने वाले चुनाव संगठन के प्रभाव की महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकते हैं।












