गयाजी। पितृपक्ष के दौरान गयाजी में देशभर से लोग अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करने पहुंच रहे हैं। इसी बीच बोधगया की धर्मारण्य वेदी पर मंगलवार को ऐसा भावुक दृश्य देखने को मिला, जिसने वहां मौजूद लोगों को भी कुछ देर के लिए ठहरने पर मजबूर कर दिया। महज 10 वर्ष का एक बच्चा अपने दिवंगत पिता की तस्वीर सामने रखकर उनके लिए पिंडदान कर रहा था। उम्र इतनी कम कि इस उम्र में आमतौर पर बच्चे अपने पिता का हाथ पकड़कर धार्मिक स्थलों पर घूमते हैं, लेकिन ऋषि राज को इसी उम्र में पिता के लिए पितृकर्म की जिम्मेदारी निभानी पड़ी।
धनबाद के रहने वाले 10 वर्षीय ऋषि राज अपने परिवार के साथ पितृपक्ष में पिंडदान करने के लिए बोधगया पहुंचे थे। धर्मारण्य वेदी पर जब कर्मकांड शुरू हुआ तो ऋषि के सामने उनके दिवंगत पिता चेतलाल नोनिया की तस्वीर रखी गई। पिता की तस्वीर को देखते ही बच्चे की आंखों से आंसू छलक पड़े। कुछ देर तक वह तस्वीर को निहारता रहा और फिर पंडितों के मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से पिंड अर्पित किया। इस दौरान उसकी मां, चाचा और परिवार के अन्य सदस्य भी वहां मौजूद रहे।
ऋषि के लिए यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। पिता की तस्वीर सामने होने के कारण उसके लिए यह पल भावनाओं से भरा हुआ था। कर्मकांड के दौरान वह बार-बार पिता की तस्वीर की ओर देख रहा था। आंखों में आंसू थे और चेहरे पर पिता को खोने का दर्द साफ दिखाई दे रहा था। पास बैठी उसकी मां भी बेटे को इस तरह पिता की तस्वीर के सामने पिंडदान करते देखकर भावुक हो उठीं। धर्मारण्य वेदी पर मौजूद परिवार के लोगों ने भी इस दौरान बच्चे का साथ दिया।
पितृपक्ष में गयाजी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पिंडदान की प्रक्रिया धार्मिक आस्था से जुड़ी होती है। लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों के लिए यहां आकर पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं। गयाजी प्रशासन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार पितृपक्ष के दौरान यहां पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति की कामना के साथ विभिन्न पिंडवेदियों पर धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस वर्ष भी पितृपक्ष मेला 26 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है।
इसी धार्मिक परंपरा के तहत ऋषि राज भी अपने पिता के लिए पिंडदान करने बोधगया पहुंचे थे। धर्मारण्य वेदी पर कर्मकांड के दौरान पिता की तस्वीर को सामने रखकर जब उसने पिंड अर्पित किया तो वहां मौजूद लोगों का ध्यान भी उसकी ओर चला गया। एक छोटे बच्चे को अपने पिता की तस्वीर के सामने बैठकर पितृकर्म करते देख कई लोग भावुक हो गए। यह दृश्य पिता और बेटे के रिश्ते की गहराई को सामने लाने वाला था।
ऋषि अपनी मां, चाचा और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ धनबाद से बोधगया आए थे। परिवार के लोगों के लिए भी यह यात्रा सामान्य धार्मिक यात्रा नहीं रही। पिता के निधन के बाद परिवार ने ऋषि को संभाला और अब जब वह अपने पिता के लिए पिंडदान करने बैठा तो सभी की भावनाएं एक साथ उमड़ पड़ीं। मां के लिए यह क्षण विशेष रूप से कठिन रहा, क्योंकि एक तरफ पति की यादें थीं और दूसरी तरफ सामने बैठा उनका छोटा बेटा था, जो पिता की आत्मा की शांति के लिए धार्मिक कर्मकांड कर रहा था।
पिता की तस्वीर सामने रखे जाने के बाद ऋषि काफी देर तक उसे देखता रहा। इसके बाद परिवार के सदस्यों और पंडितों के मार्गदर्शन में उसने पिंडदान की प्रक्रिया पूरी की। मंत्रोच्चार के बीच ऋषि ने अपने पिता के लिए प्रार्थना की। बच्चे की आंखों से निकल रहे आंसू उस पूरे धार्मिक वातावरण को और भावुक बना रहे थे। परिवार के लोग उसे संभालते रहे, लेकिन पिता की तस्वीर सामने आने पर उसकी भावनाएं बार-बार बाहर आ रही थीं।
गयाजी में पितृपक्ष के दौरान ऐसी अनेक भावुक तस्वीरें सामने आती हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने दिवंगत परिजनों की स्मृति में यहां पहुंचते हैं। किसी के लिए यह वर्षों से अधूरा पितृकर्म पूरा करने का अवसर होता है तो किसी के लिए पहली बार अपने माता-पिता या परिवार के किसी सदस्य के लिए पिंडदान करने का समय। ऋषि राज का मामला इसलिए अलग दिखाई दिया क्योंकि पिंडदान करने वाला बच्चा महज 10 वर्ष का था और वह अपने पिता के लिए यह कर्म कर रहा था।
धर्मारण्य वेदी बोधगया की प्रमुख पिंडवेदियों में शामिल है। पितृपक्ष की तिथियों में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और निर्धारित विधि के अनुसार पिंडदान करते हैं। धार्मिक परंपरा में इस वेदी का विशेष महत्व बताया जाता है। गयाजी में पिंडदान की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और पितृपक्ष के दौरान यहां देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं का आगमन होता है।
ऋषि के पिंडदान के दौरान भी धर्मारण्य वेदी पर धार्मिक गतिविधियां जारी थीं। आसपास अन्य श्रद्धालु अपने-अपने परिजनों के लिए कर्मकांड कर रहे थे। इसी बीच पिता की तस्वीर सामने रखे एक बच्चे का भावुक दृश्य लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। ऋषि के चेहरे पर पिता को खोने की पीड़ा और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का भाव एक साथ दिखाई दे रहा था।
पिता और बेटे का रिश्ता अक्सर बचपन की सबसे मजबूत यादों में शामिल होता है। छोटे बच्चे के लिए पिता का साथ सुरक्षा और स्नेह का भाव देता है। ऐसे में कम उम्र में पिता को खोना किसी भी बच्चे के लिए बेहद कठिन अनुभव हो सकता है। ऋषि के सामने जब पिता की तस्वीर रखी गई तो उसके आंसुओं ने इस भावनात्मक रिश्ते को बयां कर दिया। वह कुछ कह नहीं रहा था, लेकिन तस्वीर को लगातार देखते रहना उसके मन की स्थिति को सामने ला रहा था।
ऋषि की मां के लिए भी यह पल बेहद भावुक था। पति की तस्वीर के सामने उनका छोटा बेटा बैठा था और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी कर रहा था। बेटे को कर्मकांड करते देखकर मां की आंखें भी नम हो गईं। परिवार के अन्य सदस्य शांत बैठे रहे और पूरी प्रक्रिया के दौरान ऋषि के साथ मौजूद रहे।
पितृपक्ष में गयाजी आने वाले परिवारों के लिए धार्मिक कर्मकांड के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी महत्वपूर्ण होता है। लोग अपने पूर्वजों की यादों को लेकर यहां आते हैं और पिंडदान के दौरान बीते जीवन की स्मृतियां सामने आ जाती हैं। ऋषि के मामले में पिता की तस्वीर ने इस भावनात्मक पक्ष को और गहरा कर दिया। उसके लिए पिता की याद केवल परिवार की बात नहीं थी, बल्कि उसी तस्वीर के सामने बैठकर उसने अपने पिता के लिए पिंड अर्पित किया।
गयाजी की धार्मिक परंपरा में पिंडदान को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। जिला प्रशासन की पितृपक्ष संबंधी आधिकारिक वेबसाइट भी गया को पिंडदान की प्रमुख धार्मिक भूमि के रूप में प्रस्तुत करती है, जहां श्रद्धालु अपने पूर्वजों के लिए कर्मकांड करने पहुंचते हैं। पितृपक्ष मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए प्रशासन की ओर से भी सुविधाओं और व्यवस्थाओं पर काम किया जाता है।
इस वर्ष पितृपक्ष के दौरान गयाजी में देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी है। कोई कई वर्षों से लंबित पितृकर्म पूरा करने पहुंच रहा है तो कोई पहली बार अपने दिवंगत परिजन के लिए पिंडदान कर रहा है। कुछ दिन पहले भी गयाजी में मध्य प्रदेश के भोपाल से आई एक मां-बेटे की जोड़ी अपने दिवंगत पति और पिता के लिए पिंडदान करते हुए भावुक हो गई थी। उस मामले में 17 वर्ष बाद बेटे ने अपने पिता के लिए पिंडदान किया था।
ऋषि राज की कहानी इन भावुक घटनाओं से अलग इसलिए भी है क्योंकि यहां पितृकर्म करने वाला बच्चा अभी सिर्फ 10 वर्ष का है। पिता की तस्वीर के सामने बैठकर पिंडदान करते समय उसकी आंखों से निकले आंसू वहां मौजूद लोगों के लिए भी भावुक क्षण बन गए। परिवार के लोगों ने बताया कि ऋषि अपने पिता की याद में इस धार्मिक कर्मकांड में शामिल हुआ।
कर्मकांड पूरा होने के बाद भी पिता की तस्वीर ऋषि के लिए भावनाओं का केंद्र बनी रही। पिता को खोने के बाद परिवार के साथ आगे बढ़ रहे इस बच्चे के लिए गयाजी की यात्रा उनकी स्मृतियों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर रही। धार्मिक प्रक्रिया पूरी करते हुए उसने पिता की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ पितृकर्म पूरा किया।
धर्मारण्य वेदी पर हुआ यह दृश्य पितृपक्ष की उस भावना को भी सामने लाता है, जिसमें लोग अपने दिवंगत परिजनों को याद करने के लिए दूर-दूर से गयाजी पहुंचते हैं। यहां होने वाले कर्मकांड में धार्मिक आस्था के साथ परिवार की व्यक्तिगत स्मृतियां भी जुड़ी रहती हैं। किसी के लिए यह अपने पिता को याद करने का अवसर होता है तो किसी के लिए मां, दादा-दादी या परिवार के किसी अन्य सदस्य के प्रति श्रद्धांजलि देने का समय।
ऋषि राज के लिए यह पितृपक्ष अपने पिता की यादों से जुड़ा रहा। जिस उम्र में उसे पिता के साथ त्योहार और धार्मिक आयोजन देखने चाहिए थे, उसी उम्र में उसने पिता की तस्वीर सामने रखकर उनके लिए पिंडदान किया। कर्मकांड के दौरान छलके उसके आंसू उस रिश्ते की याद दिलाते रहे, जिसे उम्र की सीमा से नहीं बांधा जा सकता।
बोधगया की धर्मारण्य वेदी पर मंगलवार को हुआ यह दृश्य कुछ समय के लिए वहां मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहा। पिंडदान की प्रक्रिया अपने निर्धारित तरीके से चलती रही, लेकिन 10 वर्षीय ऋषि और उसके सामने रखी पिता की तस्वीर ने पूरे वातावरण को भावुक कर दिया। मां और परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी में ऋषि ने पिंड अर्पित किया और अपने दिवंगत पिता के लिए प्रार्थना की।
पितृपक्ष का यह आयोजन परिवारों को अपने पूर्वजों को स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर देता है। ऋषि राज ने भी इसी परंपरा के तहत अपने पिता चेतलाल नोनिया के लिए पिंडदान किया। लेकिन उसकी कम उम्र और पिता की तस्वीर सामने आने के बाद छलके आंसुओं ने इस धार्मिक अनुष्ठान को एक बेहद मार्मिक पारिवारिक क्षण में बदल दिया। गयाजी की धर्मारण्य वेदी पर हुआ यह दृश्य लंबे समय तक वहां मौजूद लोगों की स्मृतियों में बना रहने वाला रहा।












