हिमाचल की यूनिवर्सिटी में भर्तियों का तरीका बदलेगा: HPPSC करेगा रिक्रूटमेंट चर्चा के बाद पारित होगा विधेयक, अतिक्रमणकारी परिवार की बहू चुनाव नहीं लड़ पा

हिमाचल की छह सरकारी यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की भर्ती HPPSC से होगी। वित्त सचिव निगरानी करेंगे। अतिक्रमणकारी परिवार की बहू के चुनाव लड़ने पर भी रोक लगेगी।
हिमाचल की यूनिवर्सिटी में भर्तियों का तरीका बदलेगा: HPPSC करेगा रिक्रूटमेंट चर्चा के बाद पारित होगा विधेयक, अतिक्रमणकारी परिवार की बहू चुनाव नहीं लड़ पा
Photo Credit / Attribution: Google

हिमाचल प्रदेश में सरकारी विश्वविद्यालयों की भर्ती व्यवस्था और पंचायत चुनाव के नियमों में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राज्य सरकार ने मंगलवार को विधानसभा के मानसून सत्र में हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक-2026 और हिमाचल प्रदेश पंचायती राज (दूसरा संशोधन) विधेयक-2026 समेत कई विधेयक सदन में पेश किए। विश्वविद्यालय से जुड़े प्रस्ताव में शिक्षकों की सीधी भर्ती हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग यानी HPPSC के माध्यम से कराने की व्यवस्था की गई है। वहीं गैर-शिक्षण पदों की भर्ती हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग या सरकार की ओर से अधिसूचित किसी अन्य भर्ती एजेंसी के माध्यम से कराने का प्रावधान रखा गया है। विधेयक पर सदन में चर्चा के बाद इसे पारित किया जाना प्रस्तावित है।

सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, मेरिट आधारित और जवाबदेह बनाना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत शिक्षकों की भर्ती विश्वविद्यालय स्तर पर अलग-अलग प्रक्रिया से करने के बजाय HPPSC के जरिए की जाएगी। चयन के दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC की ओर से निर्धारित योग्यता, मानक और चयन प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। इससे शिक्षकों की नियुक्ति में एक समान प्रक्रिया लागू करने की कोशिश की गई है। HPPSC की मौजूदा व्यवस्था में भी उच्च शिक्षा विभाग के सहायक प्रोफेसर पदों पर भर्ती के लिए आयोग विज्ञापन और चयन परीक्षाएं आयोजित करता रहा है।

प्रस्तावित संशोधन का दायरा हिमाचल प्रदेश के छह सरकारी विश्वविद्यालयों तक रहेगा। इनमें हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला, सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी, हिमाचल प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय हमीरपुर, डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय सोलन, चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर और अटल आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय नेरचौक शामिल हैं। इन विश्वविद्यालयों को सरकार की ओर से विभिन्न शैक्षणिक, शोध और प्रशासनिक गतिविधियों के लिए आर्थिक सहायता भी मिलती है।

नई व्यवस्था में केवल भर्ती प्रक्रिया ही नहीं बदलेगी, बल्कि विश्वविद्यालयों के वित्तीय मामलों पर भी सरकार की निगरानी बढ़ेगी। संशोधन विधेयक में प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक संबंधित विश्वविद्यालय की वित्त समिति के अध्यक्ष राज्य सरकार के वित्त सचिव होंगे। इससे पहले वित्त समिति का नेतृत्व कुलपति या उनके नामित प्रतिनिधि के स्तर पर होता था। सरकार का तर्क है कि वित्त सचिव की अध्यक्षता से विश्वविद्यालयों में वित्तीय अनुशासन मजबूत होगा और सरकारी धन के इस्तेमाल की निगरानी अधिक प्रभावी तरीके से की जा सकेगी।

विधेयक में उन फैसलों को भी वित्त समिति के सामने रखने का प्रावधान है जिनका सीधा वित्तीय असर विश्वविद्यालय पर पड़ता है। इसमें नए पदों का सृजन, मौजूदा पदों का अपग्रेडेशन, पदों को भरना, भर्ती और पदोन्नति से जुड़े नियम बनाना या उनमें संशोधन करना तथा कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और अन्य सेवा शर्तों में बदलाव जैसे मामले शामिल हैं। वित्त समिति की सिफारिश के बाद संबंधित विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद या बोर्ड इन प्रस्तावों पर विचार करेगा और फिर अपनी राय के साथ मामला राज्य सरकार के पास भेजा जाएगा।

मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की सरकार ने इस बदलाव के पीछे विश्वविद्यालयों में सामने आए वित्तीय कुप्रबंधन और वित्तीय अनुशासन की कमी को भी वजह बताया है। सरकार के मुताबिक विश्वविद्यालयों को मिलने वाली सरकारी सहायता का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से होना चाहिए और नियुक्तियों से लेकर वेतन-भत्तों तक के वित्तीय फैसलों में जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रस्तावित कानून का मकसद इसी निगरानी को संस्थागत रूप देना है।

इस बदलाव का असर विश्वविद्यालयों में भविष्य की नियुक्तियों पर खास तौर पर दिखाई दे सकता है। अभी तक कई विश्वविद्यालयों में भर्ती प्रक्रिया विश्वविद्यालय की अपनी चयन व्यवस्था के तहत आगे बढ़ती रही है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में नियुक्तियों को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। जुलाई 2026 में विश्वविद्यालय में वर्ष 2014 से हुई 186 नियुक्तियों की जांच शुरू होने की खबर सामने आई थी। कैग रिपोर्ट में भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी कथित अनियमितताओं के संकेत मिलने के बाद जांच समिति गठित की गई थी। ऐसे माहौल में सरकार का दावा है कि आयोग के माध्यम से भर्ती कराने से चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और मेरिट को बढ़ावा मिलेगा।

इसी बीच हिमाचल सरकार ने पंचायत चुनावों से जुड़ा एक अहम संशोधन विधेयक भी विधानसभा में पेश किया है। इसके तहत सरकारी या शामलात यानी गांव की साझा जमीन पर अवैध कब्जे से जुड़े मामलों में परिवार की बहू को भी चुनाव लड़ने से रोकने का प्रावधान किया गया है। सरकार का उद्देश्य उस स्थिति को रोकना है जिसमें किसी व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर अयोग्यता लागू होने के बाद परिवार की दूसरी सदस्य, खासकर बहू, को उम्मीदवार बनाकर नियमों को दरकिनार किया जा सके।

इससे पहले मई 2026 में सरकार ने इसी व्यवस्था को लेकर अध्यादेश जारी किया था। उस समय पंचायती राज कानून में परिवार की परिभाषा में बहू को शामिल किया गया था। अब विधानसभा में विधेयक लाकर उस अध्यादेश को नियमित कानून का रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है। संशोधन का असर उन मामलों में होगा जहां उम्मीदवार या कानून में परिभाषित परिवार का सदस्य सरकारी, पंचायत, नगर निकाय, सहकारी संस्था या अन्य संबंधित भूमि पर अवैध कब्जे के कारण अयोग्यता के दायरे में आता है।

प्रस्तावित प्रावधान का सीधा मतलब यह है कि यदि परिवार में निर्धारित श्रेणी का कोई सदस्य सरकारी या शामलात जमीन पर अवैध कब्जे के मामले में अयोग्यता के दायरे में आता है, तो केवल उम्मीदवार बदलकर पंचायत चुनाव लड़ने की कोशिश आसान नहीं होगी। खास तौर पर बहू को उम्मीदवार बनाकर पुराने प्रावधान की कथित खामी का फायदा उठाने की संभावना को बंद करने की कोशिश की गई है। सरकार इसे पंचायत स्तर पर कानून के पालन और पारदर्शिता से जोड़ रही है।

रिपोर्टों के अनुसार, संशोधन में अयोग्यता की अवधि को लेकर भी प्रावधान रखा गया है। जमीन पर अवैध कब्जे की स्थिति में अयोग्यता कब्जा हटाने या संबंधित व्यक्ति को कब्जे से बेदखल किए जाने की तारीख से छह साल तक प्रभावी रहने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य केवल चुनाव के समय नामांकन रोकना नहीं, बल्कि अतिक्रमण को पंचायत चुनावों की पात्रता से जोड़कर लंबे समय तक प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना है।

हिमाचल विधानसभा का मौजूदा मानसून सत्र 21 अगस्त से 3 सितंबर 2026 तक चल रहा है। विधानसभा की आधिकारिक ई-विधान वेबसाइट पर 2 सितंबर की कार्यसूची भी उपलब्ध है। मंगलवार को सरकार ने कई विधेयक सदन में रखे और अब सत्र के अंतिम दिनों में इन पर चर्चा और पारित करने की प्रक्रिया आगे बढ़नी है।

विश्वविद्यालय भर्ती और पंचायत चुनाव से जुड़े इन दोनों प्रस्तावों का असर अलग-अलग क्षेत्रों में देखने को मिलेगा। विश्वविद्यालयों में नौकरी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए HPPSC के जरिए शिक्षक भर्ती की व्यवस्था का मतलब चयन प्रक्रिया का अधिक केंद्रीकृत होना होगा। वहीं गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति राज्य चयन आयोग अथवा सरकार की ओर से अधिकृत एजेंसी के जरिए की जाएगी। दूसरी तरफ पंचायत चुनाव में उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे लोगों के लिए परिवार के भूमि अतिक्रमण से जुड़ी स्थिति महत्वपूर्ण हो जाएगी।

सरकार का दावा है कि विश्वविद्यालयों में भर्ती और वित्तीय निर्णयों को अधिक जवाबदेह बनाने तथा पंचायत चुनावों में अतिक्रमण से जुड़े मामलों पर सख्ती करने का उद्देश्य प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना है। हालांकि विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक अभी प्रस्तावित कानूनी बदलाव के चरण में है और सदन में चर्चा तथा पारित होने के बाद ही इसके अंतिम प्रावधान प्रभावी होंगे। इसी तरह पंचायती राज संशोधन को भी विधानसभा की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसलिए इन प्रावधानों का अंतिम स्वरूप विधेयक पर सदन की चर्चा और पारित कानून के आधार पर तय होगा।

Leave a comment