नाजुक नवजात ‘जीविका’ जीवन-मृत्यु के बीच लड़ रही जंग, माता-पिता अस्पताल में छोड़कर हुए लापता

महात्मा गांधी जिला अस्पताल में 600 ग्राम वजन की नवजात ‘जीविका’ पालना घर में छोड़ी गई। ICU में इलाज जारी, माता-पिता का पता नहीं, डॉक्टरों की टीम बचाने में जुटी।

राजस्थान के महात्मा गांधी जिला चिकित्सालय में गुरुवार को एक मार्मिक घटना सामने आई, जब ‘पालना घर’ में मात्र 600 ग्राम वजन की प्रीमैच्योर नवजात बालिका को छोड़ दिया गया। गंभीर रूप से कमजोर बच्ची की हर सांस जीवन के लिए संघर्ष बन गई, जिसके बाद एनआईसीयू टीम ने तुरंत उपचार शुरू कर उसे बचाने की कोशिशें तेज कर दीं।

Rajasthan: महात्मा गांधी जिला चिकित्सालय में गुरुवार सुबह 11:32 बजे ‘पालना घर’ में रखी गई घंटी बजी तो स्टाफ ने देखा कि कोई 600 ग्राम वजन की अत्यंत नाजुक प्रीमैच्योर नवजात बालिका को छोड़ गया है। बच्ची की हालत बेहद गंभीर थी l सांस लेने में कठिनाई, शरीर में कमजोरी और जीवन के संकेत बेहद धीमे। एनआईसीयू टीम तुरंत सक्रिय हुई और नवजात को वेंटिलेटर पर रखा गया। 

शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. इंदिरा सिंह चौहान के अनुसार बच्ची वर्तमान में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही है, लेकिन डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की लगातार कोशिशें जारी हैं। बच्ची के माता-पिता का पता नहीं चल पाया है, जबकि अस्पताल प्रशासन मामले की जांच में जुटा है। इस घटना ने जहां मानवता को झकझोर दिया, वहीं चिकित्सा टीम की तत्परता ने उम्मीद की एक नई किरण भी जगाई है।

नवजात को मिला नया नाम ‘जीविका’

बाल कल्याण समिति ने इस दर्दभरी घटना के बीच एक मानवीय पहल करते हुए नवजात का नाम ‘जीविका’ रखा, जिसका अर्थ है जीवन का आधार। यह नाम अब बच्ची की पहचान के साथ उसकी संघर्ष की उम्मीद भी बन गया है। समिति अध्यक्ष चंद्रकला ओझा ने बताया कि बच्ची की स्थिति बेहद नाजुक है और डॉक्टरों की टीम लगातार उसके उपचार में जुटी है।

अस्पताल अधीक्षक डॉ. अरुण कुमार गौड़ ने आमजन से जीविका की सलामती के लिए दुआ करने की अपील की। उन्होंने कहा कि चिकित्सा टीम हर संभव प्रयास कर रही है कि यह नन्ही जान जीवन की जंग जीत सके।

छोड़ गई संवेदनहीनता की छाप

समाज की संवेदनहीनता इस घटना में साफ दिखाई देती है, जहां एक नवजात को पालने में छोड़ दिया गया और उसके जीवन-मरण की जिम्मेदारी डॉक्टरों पर छोड़ दी गई। जन्म के कुछ ही घंटों में मां-बाप का साथ छूटना किसी भी बच्चे के लिए सबसे बड़ा आघात है। यह स्थिति समाज में बढ़ती बेरुखी और जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने की चिंताजनक तस्वीर को सामने लाती है।

मानवता ने थामी नन्ही जान की डोर

लेकिन इसी कठिन समय में अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने मानवता की मिसाल पेश की। टीम ने तत्काल वेंटिलेटर सपोर्ट देते हुए बच्ची को सुरक्षित रखने की हर संभव कोशिश की। हर डॉक्टर उसकी धड़कन और सांस पर पल-पल नजर रख रहा है। जीविका की जिंदगी की इस लड़ाई में चिकित्सा कर्मियों का समर्पण और मानवीय भावनाएं उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रही हैं।

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