CJI Surya Kant ने कहा- 'न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता का विश्वास बनाए रखना'

CJI Surya Kant ने कहा कि न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता का विश्वास बनाए रखना है। जानें उनके बयान की मुख्य बातें, न्यायिक पारदर्शिता और

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि वर्तमान समय में न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती आम जनता का अदालतों पर विश्वास बनाए रखना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी कायम रह सकती है जब न्यायाधीश अपने ज्ञान, ईमानदारी और निष्पक्षता के उच्च मानकों पर खरे उतरें।

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) सूर्यकांत ने कहा है कि दुनिया भर की न्यायपालिकाओं के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी अदालत की विश्वसनीयता जजों के ज्ञान, ईमानदारी, निष्पक्षता और समयबद्ध न्याय देने की प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है।

रूस की राजधानी मॉस्को में भारतीय सुप्रीम कोर्ट और रूसी संघ के सुप्रीम कोर्ट के बीच आयोजित एक उच्चस्तरीय न्यायिक संवाद को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी की। कार्यक्रम में रूस के सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिकारियों और न्यायिक प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।

न्यायपालिका की ताकत जनता के भरोसे में

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी है। यदि लोगों का अदालतों पर विश्वास कमजोर होता है, तो न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता भी प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि बदलते सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिवेश में अदालतों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सुलभ बनाना आवश्यक है। हालांकि, किसी भी न्यायिक प्रणाली की असली ताकत आधुनिक संसाधनों में नहीं, बल्कि न्यायाधीशों की नैतिकता और निष्पक्षता में निहित होती है।

तकनीक न्याय तक पहुंच बढ़ा सकती है, लेकिन न्याय नहीं दे सकती

CJI Surya Kant ने कहा- 'न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता का विश्वास बनाए रखना'

अपने संबोधन में CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक अदालतों की कार्यक्षमता बढ़ाने, मामलों के प्रबंधन को बेहतर बनाने और न्याय तक लोगों की पहुंच आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक केवल एक सहायक उपकरण है। न्यायिक निर्णय लेना एक संवेदनशील और मानवीय प्रक्रिया है, जिसे मशीनों या एल्गोरिदम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

उनके अनुसार, न्याय केवल तथ्यों और कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय संवेदनाएं, सामाजिक संदर्भ और नैतिक विवेक भी शामिल होते हैं। यही कारण है कि AI न्यायाधीशों की भूमिका का विकल्प नहीं बन सकता।

भारत में डिजिटल न्याय प्रणाली का विस्तार

मुख्य न्यायाधीश ने भारत में न्यायिक प्रणाली के डिजिटलीकरण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि भारतीय न्यायपालिका ने हाल के वर्षों में तकनीक आधारित सुधारों को तेजी से अपनाया है, जिससे अदालतों की कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी और कुशल बनी है। भारत में अब कई न्यायिक सेवाएं डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हैं। 

इनमें ऑनलाइन केस फाइलिंग, डिजिटल केस मैनेजमेंट सिस्टम, अदालती रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इन पहलों ने न केवल अदालतों की कार्यक्षमता बढ़ाई है, बल्कि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए भी न्याय तक पहुंच को आसान बनाया है।

AI का उपयोग शोध और अनुवाद तक सीमित

न्यायपालिका में AI की भूमिका पर बोलते हुए CJI सूर्यकांत ने बताया कि भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग मुख्य रूप से कानूनी शोध, दस्तावेज़ प्रबंधन और न्यायिक फैसलों के अनुवाद के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका AI की मदद से अदालतों के महत्वपूर्ण निर्णयों का 16 क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद कर रही है, जिससे न्यायिक जानकारी अधिक लोगों तक उनकी मातृभाषा में पहुंच सके।

हालांकि, उन्होंने दोहराया कि विवादों का निपटारा करने, साक्ष्यों का मूल्यांकन करने या अंतिम निर्णय सुनाने जैसे मूल न्यायिक कार्यों में AI की कोई भूमिका नहीं होगी।

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