बिहार चुनाव 2025 में NDA ने 200 के करीब सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। महागठबंधन और जन सुराज पार्टी पिछड़ गए। जनता ने विकास और सुशासन में भरोसा जताया, विपक्ष को रणनीति बदलने की चुनौती।
Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने शानदार और ऐतिहासिक जीत हासिल की है। 243 सदस्यीय विधानसभा में NDA ने न केवल 160 सीटों का आंकड़ा पार किया बल्कि 200 सीटों के करीब पहुँचकर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। यह जीत इस बात का संकेत है कि बिहार की जनता ने विकासोन्मुखी और प्रगतिशील शासन में विश्वास बनाए रखा है।
चंद्रबाबू नायडू ने दी जीत पर प्रतिक्रिया
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने इस जीत को बिहार में प्रगतिशील शासन की क्षमता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के विज़न में जनता के भरोसे के रूप में देखा। उन्होंने कहा कि यह जनादेश इस बात का प्रमाण है कि बिहार की जनता ने स्पष्ट संदेश दिया है। नायडू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट में लिखा कि बिहार में राजग की ऐतिहासिक जीत प्रगतिशील शासन और प्रधानमंत्री मोदी की विकसित भारत की दृष्टि में जनता के निरंतर विश्वास को दर्शाती है।
राजग सहयोगियों की प्रतिक्रिया
NDA के सहयोगी और केंद्र में इसका प्रमुख घटक दल तेदेपा के प्रमुख ने भी बिहार में जीत हासिल करने वाले सभी उम्मीदवारों को बधाई दी। इसी तरह उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने कहा कि बिहार की जनता ने स्पष्ट और निर्णायक जनादेश देकर प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली विकासोन्मुखी सरकार को बनाए रखने का मार्ग चुना है।
महागठबंधन की स्थिति और चुनौतियाँ
तेजस्वी यादव की नेतृत्व वाली राजद को इस चुनाव में भारी नुकसान हुआ। महागठबंधन लगभग पूरी तरह से पिछड़ गया और राजद को अपनी आधी से ज्यादा सीटें गंवानी पड़ी। कांग्रेस भी इस बार मजबूती से चुनाव नहीं लड़ पाई, जिससे महागठबंधन की कमजोर छवि और बढ़ गई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, महागठबंधन ने इस चुनाव में जनता का भरोसा जीतने में विफलता दिखाई।
जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन
पिछले चुनावों में प्रशांत किशोर की नई पार्टी, जन सुराज पार्टी, को कुछ लोग एक्स-फैक्टर मान रहे थे। लेकिन इस चुनाव में इसका प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा। पार्टी ने बिहार की 200 से अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं हो पाई। इसके कारण जनता में पार्टी का प्रभाव बहुत कम दिखा और चुनाव परिणामों में कोई खास बदलाव नहीं आया।








