इस साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के आए नतीजों ने सूबे की सियासत को एक बार फिर से हिलाकर रख दिया है। कभी कम्युनिस्टों के अजेय गढ़ को ढहाने वाली ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) आज अपने ही वजूद की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजरती दिख रही है। हालिया चुनाव परिणामों के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर उठे असंतोष ने राज्य की सियासत को नई बहस में ला खड़ा किया है। पार्टी के भीतर कथित टूट और असहमति की खबरों के बीच एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि जिस पार्टी ने कांग्रेस को बंगाल में लगभग समाप्त कर दिया, वह खुद आज अपनी राजनीतिक चुनौतियों का सामना क्यों कर रही है। इसी संदर्भ में ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर और कांग्रेस से अलग होकर TMC की स्थापना की कहानी फिर सुर्खियों में है।
कांग्रेस से शुरू हुआ था ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर
ममता बनर्जी का राजनीतिक करियर 1970 के दशक में कांग्रेस के छात्र संगठन से शुरू हुआ था। एक साधारण पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने अपनी जमीनी पकड़ और आक्रामक राजनीतिक शैली से पहचान बनाई। 1984 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जादवपुर सीट से CPI(M) के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा नाम हासिल किया।
यह जीत उस समय की सहानुभूति लहर और उनके मजबूत जनसंपर्क का परिणाम मानी जाती है, जिसने उन्हें देश की सबसे युवा और चर्चित सांसदों में शामिल कर दिया।
कांग्रेस से अलग होने की पृष्ठभूमि
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1990 के दशक तक पहुंचते-पहुंचते ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल कांग्रेस के बीच मतभेद गहराते गए। कांग्रेस छोड़ने के पीछे कई प्रमुख कारण माने जाते हैं—
- वामपंथ और कांग्रेस के बीच कथित मिलीभगत का आरोप: ममता बनर्जी का आरोप था कि राज्य कांग्रेस का एक बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ CPI(M) के साथ समझौते में काम कर रहा है, जिससे वामपंथ के खिलाफ वास्तविक विपक्ष कमजोर हो रहा था।
- जमीनी राजनीति बनाम पारंपरिक नेतृत्व: ममता का मानना था कि वामपंथी संगठन को चुनौती देने के लिए आक्रामक और जनआंदोलन आधारित राजनीति जरूरी है, जबकि कांग्रेस का एक धड़ा पारंपरिक और सीमित रणनीति पर भरोसा करता था।
- संगठनात्मक विवाद और चुनावी धांधली के आरोप: 1997 के भीतरूनी चुनावों में हार के बाद ममता बनर्जी ने धांधली के आरोप लगाए। यह घटनाक्रम उनके लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ और कांग्रेस नेतृत्व से उनका भरोसा टूट गया।
- केंद्रीय नेतृत्व से असहमति: ममता बनर्जी ने कई बार कांग्रेस हाईकमान से पश्चिम बंगाल में रणनीति बदलने की मांग की, लेकिन उनकी मांगों को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।
राजनीतिक इतिहास में 21 जुलाई 1993 की घटना को ममता बनर्जी के सफर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है। उस दिन युवा कांग्रेस के नेतृत्व में हुए आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी। इस घटना ने ममता बनर्जी को गहराई से प्रभावित किया और कांग्रेस नेतृत्व के प्रति उनके असंतोष को और मजबूत किया।
TMC की स्थापना और नई राजनीतिक शुरुआत
दिसंबर 1997 में कांग्रेस से अलग होने के बाद 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITMC) की स्थापना की। “तृणमूल” शब्द का अर्थ है—जड़ से जुड़ा हुआ, जो उनकी जमीनी राजनीति के दृष्टिकोण को दर्शाता है। उनका उद्देश्य एक ऐसी पार्टी बनाना था जो सीधे आम जनता, ग्रामीण भारत और वंचित वर्गों की आवाज बने।
TMC के गठन के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संरचना में बड़ा बदलाव आया। कांग्रेस, जो कभी राज्य की प्रमुख ताकत थी, धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, TMC के उदय ने वामपंथी शासन के लंबे दौर को चुनौती दी और राज्य में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत की।









