ब्रिटेन ने आसियान के साथ रणनीतिक साझेदारी को दी नई दिशा, यूरोप के साथ संबंध सुधारने के बीच इंडो-पैसिफिक पर भी रहेगा फोकस

ब्रिटेन की नई लेबर सरकार ने यूरोप से रिश्ते सुधारने के साथ आसियान देशो के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने का संकेत दिया। व्यापार, सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक पर जोर

ब्रिटेन की नई सरकार ने यूरोप के साथ संबंध मजबूत करने की नीति के समानांतर दक्षिण-पूर्व एशिया के आसियान देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को भी प्राथमिकता दी है। विदेश मंत्री एड मिलिबैंड की पहली विदेश यात्रा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।

लंदन: ब्रिटेन की नई लेबर सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह यूरोप के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की दिशा में काम करेगी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की अनदेखी की जाएगी। इसी रणनीति के तहत नए विदेश मंत्री एड मिलिबैंड ने पद संभालने के लगभग दो दिन बाद ही फिलीपींस की राजधानी मनीला में आयोजित आसियान (ASEAN) विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेकर अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा की। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम नई विदेश नीति की शुरुआत से अधिक, ब्रेक्जिट के बाद अपनाई गई ब्रिटेन की दीर्घकालिक रणनीति की निरंतरता को दर्शाता है।

पहली विदेश यात्रा का विशेष संदेश

एड मिलिबैंड का मनीला दौरा केवल एक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह इस बात का संकेत भी था कि ब्रिटेन दक्षिण-पूर्व एशिया को अपनी वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि आसियान देशों के साथ एकजुटता दिखाना और दीर्घकालिक साझेदारी को मजबूत करना उनकी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ब्रिटेन की नई सरकार इस क्षेत्र के साथ अपने संबंधों को पहले की तरह ही मजबूत बनाए रखेगी।

पांच वर्षों के लिए नई कार्ययोजना

मनीला बैठक के दौरान ब्रिटेन और आसियान के बीच नई कार्ययोजना (Plan of Action) को भी मंजूरी दी गई, जो वर्ष 2031 तक दोनों पक्षों के सहयोग की दिशा तय करेगी। इस कार्ययोजना में समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक मजबूती, डिजिटल प्रौद्योगिकी, उभरती तकनीकों, जलवायु परिवर्तन और बहुपक्षीय सहयोग जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ ही इंडो-पैसिफिक पर आसियान के दृष्टिकोण का समर्थन करने वाला एक संयुक्त बयान भी जारी किया गया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कानून और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोहराई गई।

ब्रेक्जिट के बाद क्यों बढ़ा आसियान का महत्व

विशेषज्ञों के अनुसार, यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद ब्रिटेन को अपने व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारों का दायरा बढ़ाने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी कारण दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को विदेश नीति में अधिक महत्व मिला। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि यह बदलाव केवल ब्रेक्जिट की वजह से नहीं हुआ। ब्रिटेन पहले से ही इस क्षेत्र के साथ आर्थिक और सुरक्षा संबंध मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा था, लेकिन ब्रेक्जिट ने इस प्रक्रिया को अधिक गति दी।

व्यापार और सप्लाई चेन पर विशेष ध्यान

ब्रिटेन की नई रणनीति का एक बड़ा उद्देश्य वैश्विक व्यापार नेटवर्क को मजबूत करना भी है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। ब्रिटेन पहले ही व्यापक और प्रगतिशील ट्रांस-पैसिफिक साझेदारी समझौते (CPTPP) का सदस्य बन चुका है। इससे उसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों के साथ व्यापार और निवेश बढ़ाने का अवसर मिला है। विशेषज्ञों का मानना है कि आसियान देशों के साथ मजबूत आर्थिक संबंध ब्रिटेन की दीर्घकालिक व्यापारिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक सहयोग

आर्थिक हितों के अलावा समुद्री सुरक्षा भी ब्रिटेन और आसियान के सहयोग का प्रमुख आधार बन रही है। दक्षिण चीन सागर सहित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून, सुरक्षित समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता के समर्थन की नीति पर जोर दे रहा है। दोनों पक्ष समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, साइबर सुरक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर सहमत हैं।

यूरोप और एशिया के बीच संतुलन

नई लेबर सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूरोपीय संघ के साथ संबंध सुधारना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने यूरोपीय आयोग और यूरोपीय परिषद के शीर्ष नेताओं से बातचीत कर भविष्य में सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई है। हालांकि सरकार यह भी संदेश देना चाहती है कि यूरोप के साथ बढ़ती नजदीकी का अर्थ एशिया से दूरी बनाना नहीं है। विदेश मंत्री की पहली यात्रा इसी संतुलित दृष्टिकोण का प्रतीक मानी जा रही है।

मध्य शक्ति के रूप में नई भूमिका

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन अब स्वयं को एक ऐसी "मिडिल पावर" यानी मध्य शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जो वैश्विक महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाते हुए बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करना चाहता है। ब्रिटेन के मलेशिया, सिंगापुर और ब्रुनेई जैसे देशों के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं। इसके अलावा फाइव पावर डिफेंस अरेंजमेंट (FPDA) के माध्यम से भी उसकी क्षेत्रीय सुरक्षा में भूमिका बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि आज ब्रिटेन का प्रभाव केवल ऐतिहासिक संबंधों पर नहीं बल्कि समान भागीदारी, संवाद और व्यावहारिक सहयोग पर आधारित है।

वैश्विक चुनौतियों के बीच बढ़ेगा सहयोग

मध्य पूर्व, यूक्रेन और अन्य क्षेत्रों में जारी संघर्षों के कारण वैश्विक सप्लाई चेन, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता प्रभावित हुई है। ऐसे समय में आसियान की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

ब्रिटेन का मानना है कि बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और साझा चुनौतियों का समाधान निकालना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से दोनों पक्ष जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।

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