मथुरा का पेड़ा उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर की एक सुप्रसिद्ध पारंपरिक मिठाई है, जिसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह मुख्य रूप से भुने हुए खोया (मावा) और चीनी से बनाया जाता है। इसका भूरा रंग और इलायची की सौंधी महक इसे अन्य पेड़ों से अलग बनाती है। भगवान कृष्ण के भोग में इसका विशेष रूप से उपयोग किया जाता है।
सामग्री
- खोया (मावा): 500 ग्राम (ताजा)
- तगाार या बुरा चीनी: 1.5 कप
- दूध: 2-3 बड़े चम्मच
- शुद्ध घी: 2 बड़े चम्मच
- इलायची पाउडर: 1 छोटा चम्मच
- जायफल पाउडर: एक चुटकी (वैकल्पिक, खुशबू के लिए)
बनाने का तरीका
- खोया भूनना: एक भारी तले की कढ़ाई में घी गरम करें और खोया डालें। इसे धीमी आंच पर तब तक भूनें जब तक यह गहरा भूरा (dark brown) न हो जाए।
- दूध का उपयोग: भूनते समय यदि खोया बहुत सूखा लगे, तो इसमें थोड़ा-थोड़ा दूध डालकर भूनें। इससे रंग एक जैसा आएगा और खोया नरम रहेगा।
- ठंडा करना: जब खोया अच्छी तरह भून जाए और उसमें से सौंधी खुशबू आने लगे, तो आंच बंद कर दें और इसे थोड़ा ठंडा होने दें।
- चीनी मिलाना: जब खोया हल्का गुनगुना रहे, तब इसमें इलायची पाउडर और बुरा चीनी (तगार) मिलाएं। (ध्यान रहे: बहुत गर्म खोया में चीनी न मिलाएं, वरना वह पिघल जाएगी)।
- आकार देना: मिश्रण को अच्छी तरह मिलाकर इसके छोटे-छोटे अनगढ़ (irregular) आकार के पेड़े बना लें। अंत में इन्हें सूखे बुरा चीनी में लपेट दें।
परोसने के तरीके
- प्रसाद के रूप में: मथुरा में इसे अक्सर सूखे पत्तों के दोने में परोसा जाता है, जो इसे पारंपरिक लुक देता है।
- सजावट: आप इनके ऊपर बारीक कटे हुए बादाम या पिस्ता भी लगा सकते हैं। इसे कमरे के तापमान पर परोसना सबसे अच्छा होता है।
खाने के फायदे
मथुरा का पेड़ा मुख्य रूप से खोया (मावा) से बना होता है, इसलिए यह कैल्शियम और प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत है, जो हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने में मदद करता है। दूध का सघन रूप होने के कारण इसमें विटामिन भी पाए जाते हैं जो शरीर के पोषण के लिए अच्छे हैं। यह शरीर को तत्काल ऊर्जा (Instant Energy) प्रदान करता है, और इसमें इस्तेमाल होने वाली इलायची व जायफल जैसी सामग्रियां पाचन तंत्र को बेहतर बनाने और भूख बढ़ाने में सहायक होती हैं।













