भारत में टाइफाइड के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाओं का असर अब कम हो गया है। हाल की रिसर्च में सामने आया है कि एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंस के कारण इलाज महंगा और लंबा हो गया है। खासकर 10 साल से कम उम्र के बच्चों और प्रभावित परिवारों पर इसका सबसे बड़ा आर्थिक और स्वास्थ्य बोझ पड़ा है।
Antibiotic Resistance Crisis: हाल ही में The Lancet Regional Health Southeast Asia में प्रकाशित स्टडी के अनुसार 2023 में भारत में टाइफाइड का कुल आर्थिक बोझ लगभग 12,300 करोड़ रुपये रहा। खासकर फ्लोरोकिनोलोन जैसी दवाएं अब कई मामलों में कम असर दिखा रही हैं। रिसर्च बताती है कि 10 साल से कम उम्र के बच्चों और 70,000 परिवारों पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है। विशेषज्ञों ने सही दवा उपयोग, साफ पानी और समय पर पूरा कोर्स लेने पर जोर दिया है।
एंटीबायोटिक रजिस्टेंस बढ़ा इलाज का खर्च
हाल ही में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार टाइफाइड की दवाओं का असर अब सही ढंग से नहीं हो रहा है। मेडिकल जर्नल The Lancet Regional Health Southeast Asia की स्टडी में बताया गया है कि 2023 में भारत में टाइफाइड से जुड़ा आर्थिक बोझ लगभग 12,300 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 87% खर्च एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट संक्रमण के कारण हुआ। खासकर फ्लोरोकिनोलोन जैसी दवाएं पहले जितनी असरदार थीं, अब कई मामलों में कम प्रभावी हैं, जिससे इलाज लंबा और महंगा हो गया है।

बच्चों और परिवारों पर सबसे ज्यादा असर
स्टडी में सामने आया कि 10 साल से कम उम्र के बच्चों में एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट टाइफाइड का सबसे ज्यादा असर है। माता-पिता अक्सर इलाज बीच में रोक देते हैं या दवा का गलत इस्तेमाल करते हैं, जिससे रजिस्टेंस और बढ़ता है। देश में करीब 70,000 परिवारों पर यह आर्थिक बोझ पड़ा है, खासकर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में।
समाधान और सावधानियां
विशेषज्ञों का कहना है कि टाइफाइड से बचाव और इलाज में एंटीबायोटिक का सही इस्तेमाल बेहद जरूरी है। साफ पानी पीना, संतुलित खानपान और समय पर पूरा दवा कोर्स लेना बीमारी से बचाव में मदद करता है। इसके अलावा सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थाओं को जागरूकता फैलाने और बच्चों में सही दवा उपयोग सुनिश्चित करने की जरूरत है।












